नेशनल डेस्क: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने महाराष्ट्र सरकार के प्रति बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कानूनी मोर्चे पर उसकी कड़ी क्लास लगाई है। एक गंभीर आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार को चेतावनी दी कि कोर्ट उसे जनता के सामने बेनकाब कर देगा। अदालत ने यह तल्ख टिप्पणी महाराष्ट्र सरकार के उस दोहरे रवैये पर की है, जिसके तहत सरकारी तंत्र आरोपियों की जमानत याचिकाओं (Bail Pleas) का तो कोर्ट में पूरी ताकत से विरोध करता है, लेकिन जब जेल में बंद कैदियों के मुकदमों (Trials) की समय पर सुनवाई पूरी कराने की बात आती है, तो वह पूरी तरह ढीला साबित होता है।
'जमानत का पुरजोर विरोध, पर सुनवाई में सुस्ती' - कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की पीठ एक विदेशी नागरिक (केल्विन चिन्दोजिए ओकोरो) की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो किडनैपिंग और मर्डर से जुड़े एक केस में साल 2022 से (कुछ दस्तावेजों के अनुसार 2020 से) जेल में बंद है।
सुनवाई के दौरान जब यह तथ्य सामने आया कि आरोपी लंबे समय से न्यायिक हिरासत में है और ट्रायल कोर्ट में मुकदमे की रफ्तार बेहद धीमी है, तो जस्टिस अमानुल्लाह का गुस्सा फूट पड़ा। पीठ ने महाराष्ट्र सरकार के वकील को फटकार लगाते हुए कहा:
"हमें हर दिन महाराष्ट्र से इस तरह के मामले मिलते हैं। आप कोर्ट में जमानत का तो पुरजोर विरोध (Tooth and Nail) करते हैं, लेकिन मुकदमों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए कोई जमीनी कदम नहीं उठाते। जब हम इन मामलों की बारीकी से जांच करते हैं, तो सबूत बेहद कमजोर मिलते हैं। हम आपको (राज्य को) जनता के सामने बेनकाब कर देंगे।"
4 साल में केवल 2 गवाहों से पूछताछ, 53 बार कोर्ट नहीं लाई पुलिस
अदालत के सामने पेश किए गए आधिकारिक आंकड़े चौंकाने वाले थे। आरोपी की तरफ से दलील दी गई कि उसका केस निचली अदालत (Trial Court) में 86 तारीखों पर लिस्ट किया गया, लेकिन जेल और पुलिस प्रशासन की गंभीर लापरवाही के चलते उसे 53 बार कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया।
अदालत ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्पीडी ट्रायल (त्वरित सुनवाई) के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन माना। पीठ ने गहरी नाराजगी जताते हुए कहा, "हमें शर्मिंदगी महसूस हो रही है। चार साल बीत जाने के बाद भी अभियोजन पक्ष के कुल गवाहों में से सिर्फ दो गवाहों से पूछताछ हो पाई है। जब राज्य जमानत का विरोध करता है, तो मुकदमों को सुचारू रूप से चलाना भी उसी का कर्तव्य है, जिसमें वह पूरी तरह विफल रहा है।"
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब, नीति बनाने के निर्देश
हालांकि, शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को फिलहाल जमानत देने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी, लेकिन महाराष्ट्र सरकार के प्रशासनिक ढर्रे पर मामले को लंबित रखते हुए जवाब तलब किया है।
अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक हलफनामा (Affidavit) दायर कर बताए कि मुकदमों में इतनी देरी क्यों हो रही है। कोर्ट ने आदेश दिया कि अब से हर हफ्ते कम से कम चार गवाहों के बयान दर्ज किए जाएं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को मुकदमों की कार्यवाही तेजी से पूरी करने के लिए एक ठोस और स्पष्ट नीति (Specific Policy) बनाने के कड़े निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 24 जुलाई को मुकर्रर की गई है।