दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार को लगाई फटकार; कहा- ‘डकैती करके नहीं चल सकते अस्पताल’

Amanat Ansari 27 Oct 2026 08:49 PM 3 Mins
दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार को लगाई फटकार; कहा- ‘डकैती करके नहीं चल सकते अस्पताल’

नई दिल्ली: दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और मरीजों से वसूले जा रहे अधिक दामों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. अदालत ने सवाल उठाया कि जब दवाएं खुदरा विक्रेताओं को कम कीमत पर मिलती हैं, तो उनका अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) इतना ज्यादा क्यों रखा जाता है. अदालत ने दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण रखने वाली राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को सामान्य व्यावसायिक गतिविधि मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अदालत ने सवाल किया कि खुदरा विक्रेताओं को कम कीमत पर मिलने वाली दवाओं का MRP कई गुना अधिक रखने की अनुमति आखिर कैसे दी जा सकती है.

पीठ ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि मौजूदा व्यवस्था में मरीजों के हितों की तुलना में दवा कंपनियों और कारोबार के हितों को अधिक महत्व दिया जा रहा है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों में असामान्य बढ़ोतरी का उदाहरण देते हुए सवाल किया कि किसी दवा का मूल्य 11 हजार रुपये से बढ़ाकर 1.3 लाख रुपये कैसे किया जा सकता है.

अदालत ने कहा कि दवाओं की कीमतों में इस तरह के भारी अंतर को उचित ठहराने के लिए ठोस आधार होना चाहिए. पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि जब दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए नियामक संस्था मौजूद है, तो फिर मरीजों पर इतना आर्थिक बोझ क्यों पड़ रहा है. अदालत ने चिकित्सा सामग्री की कीमतों का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि खुदरा विक्रेता को ड्रिप लाइन 15 रुपये में मिलती है और अस्पताल में वही सामग्री 250 रुपये में बेची जाती है, तो कीमतों पर नियंत्रण के मौजूदा नियमों का क्या औचित्य रह जाता है.

पीठ ने निजी अस्पतालों की ओर से दिए जाने वाले तर्कों पर भी सवाल उठाए. अस्पतालों का कहना था कि उन्हें चौबीसों घंटे स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए बुनियादी ढांचे और कर्मचारियों पर भारी खर्च करना पड़ता है. हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि अस्पतालों के संचालन का खर्च दवाओं और चिकित्सा सामग्री पर मनमाना मुनाफा वसूलने का आधार नहीं हो सकता.

सरकार ने कहा- भारत में दवाएं सस्ती

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि भारत में कई अन्य देशों की तुलना में दवाओं की कीमतें कम हैं. इस पर अदालत ने कहा कि भारत में प्रति व्यक्ति आय भी कम है, इसलिए केवल दूसरे देशों से तुलना करके दवाओं की कीमतों को उचित नहीं ठहराया जा सकता. मरीजों की आर्थिक स्थिति और इलाज पर होने वाले खर्च को भी ध्यान में रखना जरूरी है.

कैंसर की दवाओं पर भी उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं पर मुनाफे की सीमा तय करने में देरी को लेकर भी सरकार से सवाल किए. पीठ ने पूछा कि दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने में देरी क्यों हो रही है. अदालत पहले भी दवाओं के खुदरा मूल्य और अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच बड़े अंतर पर चिंता जता चुकी है. इस मामले में दवाओं की कीमतों पर अधिक प्रभावी नियंत्रण और मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने की मांग की गई है.

मरीजों को राहत मिलेगी या नहीं?

इस मामले का सीधा संबंध आम मरीजों के इलाज के खर्च से है. यदि दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण की व्यवस्था लागू होती है, तो मरीजों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम हो सकता है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों को लेकर सरकार और संबंधित पक्षों की दलीलें सुनी हैं. अदालत की टिप्पणियां मरीजों के हितों को लेकर उसकी चिंता दर्शाती हैं, लेकिन कीमतों पर किसी नए नियम या सीमा को लागू करने का अंतिम निर्णय अलग से लिया जाना बाकी है.

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