भागलपुर: भारत-नेपाल सीमा के आसपास बदलती डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) को लेकर गृह मंत्रालय ने सर्वे की तैयारी शुरू कर दी है. पिछले कुछ वर्षों में सीमा से सटे भारतीय और नेपाली इलाकों में आबादी का ढांचा तेजी से बदला है. इसके चलते सीमाई क्षेत्रों में अक्सर तनाव की स्थिति भी देखी जा रही है. गृह मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसियां इस मुद्दे पर गंभीर हैं.
क्या है समस्या?
नो मेंस लैंड पर मौजूद कई सीमा पिलर या तो गायब हैं या क्षतिग्रस्त हो चुके हैं. पिलर न होने से सीमा रेखा का स्पष्ट चिह्न मुश्किल हो गया है. इसका फायदा असामाजिक और संदिग्ध तत्व उठा रहे हैं. एसएसबी को गश्ती और अतिक्रमण रोकने में तकनीकी दिक्कतें आ रही हैं. इस साल 25 फरवरी को सीमांचल के दौरे पर आए गृह मंत्री अमित शाह ने भी बिहार के सीमाई इलाकों में बदलते डेमोग्राफी के मुद्दे पर एसएसबी, बीएसएफ, स्थानीय जिलों के डीएम-एसपी और सुरक्षा एजेंसियों के साथ बैठक की थी.
सर्वे और आगे की योजना
एसएसबी के आईजी नीशीत कुमार उज्ज्वल ने बताया कि बदलती डेमोग्राफी को लेकर समीक्षा और सर्वे जल्द ही गृह मंत्रालय द्वारा किए जाने की योजना है. इस पर काम चल रहा है. इंडो-नेपाल सीमा के आसपास पैनी नजर रखी जा रही है. वर्तमान में बिहार, नेपाल और यूपी सेक्टर में एसएसबी की 35 से अधिक बटालियन तैनात हैं.
सर्वे पूरा होने के बाद संवेदनशील क्षेत्रों को चिन्हित कर अतिरिक्त बटालियन तैनात करने और नए बॉर्डर आउटपोस्ट (BOP) स्थापित करने का प्रस्ताव गृह मंत्रालय को भेजा जाएगा. कोसी के सुपौल तथा सीमांचल के अररिया और किशनगंज जैसे इलाके काफी संवेदनशील माने जाते हैं.