नई दिल्ली: लंबे समय से शहरी मतदाताओं की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में चल रहा मतदाता सूची संशोधन अभियान बड़ी मुसीबत बन गया है. विशेष गहन संशोधन (SIR) शुरू होने के बाद डुप्लीकेट नामों पर सख्ती बढ़ी है और अब एक व्यक्ति का नाम सिर्फ एक ही जगह रह सकता है. नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में शहरी लोग अपनी वोट गांव की लिस्ट में ही रखना चाहते हैं. इसलिए शहरों में वे SIR फॉर्म जमा ही नहीं कर रहे, जिससे शहरों की मतदाता सूची से उनका नाम पूरी तरह गायब हो रहा है.
भाजपा को खतरा साफ दिख रहा है. उसका परंपरागत शहरी वोट बैंक तेजी से सिकुड़ सकता है. ज्यादातर लोग संपत्ति, पैतृक जमीन और पंचायत चुनाव के चलते अपना वोट मूल गांव में ही बनाए रखना चाहते हैं. लखनऊ, वाराणसी, गाजियाबाद, नोएडा, आगरा, मेरठ समेत टियर-2 शहरों में मतदाता सूची घट रही है, जिससे पार्टी में हड़कंप मचा हुआ है. राज्य भर में अब तक 17.7% SIR फॉर्म वापस नहीं आए हैं. अनुमान है कि करीब 2.45 करोड़ फॉर्म गायब हैं.
अधिकारियों का कहना है कि पिछले 20 साल में इतनी सख्ती से मतदाता सूची संशोधन कभी नहीं हुआ. प्रवास, मृत्यु और फर्जी/डुप्लीकेट नामों की छंटनी के अलावा सबसे बड़ा कारण शहरी मतदाताओं का गांव की लिस्ट को प्राथमिकता देना है.
इतनी बड़ी संख्या में फॉर्म न आने से चिंतित भाजपा नेतृत्व ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रदेश अध्यक्ष और महामंत्री तक ने सभी सांसदों, विधायकों, विधान परिषद सदस्यों और पदाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि एक भी शहरी मतदाता छूटना नहीं चाहिए. पूरी प्रक्रिया पर कड़ी निगरानी में चल रही है.
चुनाव आयोग अब बाकी फॉर्म जमा करने की समय-सीमा एक हफ्ते और बढ़ाने पर विचार कर रहा है. ये 2.45 करोड़ गायब मतदाता यूपी के कुल मतदाताओं के 15-18% हैं. भाजपा के लिए यह आंकड़ा किसी बड़े झटके से कम नहीं है.