बीजेपी के लिए आगे कुआं पीछे खाई, योगी को हटाना और विकल्प ढूंढना दोनों चुनौती!

Global Bharat 16 Jul 2024 06:01: PM 6 Mins
बीजेपी के लिए आगे कुआं पीछे खाई, योगी को हटाना और विकल्प ढूंढना दोनों चुनौती!

संदीप शर्मा

आदित्यनाथ योगी ने अपने काम के स्टाइल, अपनी भाषण शैली और अपने व्यक्तित्व से अपनी ताकत और जनता के बीच अपनी पहुंच को इस कदर बढ़ा लिया है कि केन्द्रीय नेतृत्व की हालत अब योगी को लेकर सांप- छछूंदर वाली हो गई है. वो न निगलते बन रहे हैं और न ही उगलते, क्योंकि दोनों केस में नुकसान तो बीजेपी का ही है.

जब 2017 में यूपी में सीएम बनाए जाने की बात हो रही थी तो उसमें आदित्यनाथ योगी का नाम सबसे पीछे था. इनसे आगे केशव प्रसाद मौर्य, मनोज सिन्हा, लक्ष्मीकांत बाजपेयी और दिनेश शर्मा का नाम चल रहा था. मनोज सिन्हा तो करीब करीब ये मान भी चुके थे कि वो सीएम बन चुके हैं. जबकि केशव प्रसाद मौर्य इतने आश्वस्त थे कि जब उन्हें पता चला कि योगी को सीएम बनाया गया है तो उनकी तबीयत खराब हो गई थी और उन्हें एम्स में भर्ती होना पड़ा था.

आदित्यनाथ योगी इन सबसे निश्चिंत गोरखपुर में अपने मठ पर दैनिक कार्यकलाप में लगे थे. तभी अचानक उन्हें अमित शाह का फोन आता है कि इस वक्त आप कहां हैं. आप सीधे दिल्ली पहुंचिए. योगी ने असमर्थता जताते हुए कहा कि इस वक्त न तो यहां से कोइ फ्लाइट है और न ही कोई ट्रेन. शाह ने कहा कि सुबह एक स्पेशल फ्लाइट भेजता हूं आप सीधा दिल्ली पहुंचिए. आदित्यनाथ योगी अगले दिन सुबह दिल्ली पहुंचते हैं, तो उन्हें बीजेपी कार्यालय न ले जाकर पियूष गोयल के यहां ले जाया जाता है. अमित शाह वहीं पहुंचते हैं और उन्हें ये बताता हैं कि आपको लखनऊ जाकर सीएम का पदभार संभालना होगा.

इस बीच जो बाकी नाम सीएम पद के चल रहे थे उन्हें भी पार्टी को संभालना था. मनोज सिन्हा को तो मनाना फिर भी आसान था, लेकिन केशव मौर्या जो सपने संजोए हुए थे उनकी तकलीफ ज्यादा थी. वो ओबीसी के एक बड़े नेता के रूप में उभरे थे, पार्टी संगठन में भी मजबूत स्थिति में थे और उस समय पार्टी में योगी से बड़े नेता के रूप में थे. तो केन्द्रीय नेत़ृत्व ने एक तीर से दो निशाना करने चाहा और केशव मौर्या और दिनेश शर्मा दोनों को डिप्टी सीएम का पद देकर संतुष्ट करने की कोशिश की और साथ ही ये भी सोचा कि इनके जरिए आदित्यनाथ योगी पर नजर भी रख पाएंगे. और यहीं से यूपी सरकार में 2 खेमें की नींव पड़ गई.

केन्द्रीय नेतृत्व ने सोचा था कि इस तरह से वो योगी पर लगाम लगा पाएंगे. नज़र रख पाएंगे और कंट्रोल कर पाएंगे, लेकिन उन्हें पता नहीं था कि यही दांव आगे चल कर पार्टी के लिए नासूर बन जाएगा. आदित्यनाथ और दिल्ली के बीच मनमुटाव वाली कहानी पर्दे के पीछे तो 2022 के चुनाव के करीब 1 साल पहले से ही शुरू हो गई थी. लेकिन अब 2024 लोक सभा चुनाव के नतीजों के बाद खुल कर सबके सामने आ गई और एक मंच से ही खुलेआम दोनों तरफ से शब्दबाण चलने शुरू हो गए हैं. एक ने कहना शुरू किया कि संगठन बड़ा है सरकार नहीं तो दूसरी तरफ से कहा जा रहा है कि यूपी में हार कि वजह अति आत्मविश्वास है.

तो ये अति आत्मविश्वास किसका था, मोदी की गारंटी का, अमित शाह की रणनीति का या फिर जेपी नड्डा का जिन्होंने यह कहा था पार्टी को अब संघ की जरूरत नहीं है पार्टी आत्मनिर्भर हो चुकी है. पिछले दिनों भागवत से गोरखपुर में गुपचुप बैठक करने वाले योगी ने अपनी बातों में ये सवाल लोगों को सोचने के लिए छोड़ दिया है. एक तरह से योगी दिल्ली के उन नेताओं पर तीर छोड़ रहे हैं, जिन्होंने मन ही मन उनके हटाने की पूरी भूमिका तैयार कर रखी है.

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल पूरे कर चुके जेपी नड्डा और संगठन महामंत्री बी एल संतोष को भी दिल्ली के उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है जिसके तहत आदित्यानाथ योगी को सीएम पद से हटाए जाने की कवायद चल रही है. चाहे वो बदलापुर विधायक रमेश मिश्रा हों या पूर्व मंत्री मोती सिंह या फिर NDA कोटे की मंत्री अनुप्रिया पटेल जिसने भी योगी सरकार के खिलाफ बयान दिए या उनसे दिलवाए गए. सबका मकसद एक ही नजर आता है योगी को बदला जाए और उनके बदले दिल्ली की परिक्रमा करने वाले ऐसे एक नेता को बिठाया जाए जो एमपी के सीएम मोहन यादव, राजस्थान के भजनलाल शर्मा या फिर हरियाणा के नायब सिंह सैनी की तरह आदेश पालन करने वाला हो.

योगी शिवराज की तरह इतने सरल नही हैं कि बिना युद्ध लड़े आसानी से घुटने टेक दें, बल्कि योगी तो विपरीत से विपरीत हालात में भी अपनी सियासी लड़ाई लड़ने और जीतने के लिए जाने जाते हैं. योगी की एक खासियत और है कि वह यूपी में अपनी धाक तो रखते ही हैं उसके साथ साथ भारत के कई राज्यों में भी उनकी लोकप्रियता भाजपा के कई बड़े नेताओं से ज्यादा है और संसदीय राजनीति की अगर बात करें तो भी मोदी, शाह और नड्डा जैसे नेताओं से भी ज्यादा सीनियर हैं.

जहां तक बात कदकाठी की है मोदी के बाद पार्टी के सबसे लोकप्रिय और कद्दावर नेता माने जाते हैं. योगी में पार्टी और देश को भविष्य का प्रधानमंत्री नजर आता है. योगी पर न तो किसी तरह के भ्रष्टाचार के आरोप है और न ही नियम के विरुद्ध जाकर किसी बिजनेस मैन की मदद करने का और न ही परिवार के किसी सदस्य गलत तरीके से लाभान्वित करने का. योगी बिना किसी लाग लपेट के बस बुल्डोजर लिए खडे हैं जिसका रुख वो कभी भी अपने विरोधियों की ओर कर सकते हैं.

योगी के कई अलोचक उन्हें जातिवादी, धर्मवादी और अफसरों को बढ़ावा देने वाला कह सकते हैं लेकिन इनमें से कोई भी आरोप ऐसे नहीं है जिसकी वजह से योगी को हटाने की बात की जाए या ऐसी परिस्थिति पैदा की जाए कि उन्हें खुद कुर्सी छोड़नी पडे. जातिवादी और अफसरशाही को बढ़ावा देने के आरोप तकरीबन हर सीएम पर लगते रहे हैं. वहीं संगठन और सरकार की तनातनी के किस्से भी नए नहीं हैं.

अगर लोकसभा चुनाव के नतीजों की बात की जाए तो उसमें योगी का घेराव कोई कैसे कर सकता है, क्या योगी ने टिकट बांटे थे? क्या योगी ने चुनाव की रणनीति बनाई थी? क्या योगी के चेहरे पर वोट मांगे जा रहे थे? इन सभी बातों का जवाब नहीं में है. इससे अलावा भी चुनाव के दौरान दिल्ली से कई ऐसे काम किए गए जिसमें योगी को भरोसे में नहीं लिया गया. मसलन राजा भैया से बैंगलोर में मुलाकात, ब्रजेश सिंह को पार्टी के समर्थन के लिए तैयार करना. देखा जाए तो चुनाव के दौरान योगी के साथ गेम खेला गया.

चुनाव प्रचार करवाते रहे, चुनावी मंच पर तारीफ भी करते रहे और अंदर ही अंदर उनके खिलाफ राजनीतिक साजिश भी चलती रही. उन्हें ये एहसास दिलाने की कोशिश भी की गई कि बिना योगी के सहारे भी यूपी में पार्टी सबकुछ कंट्रोल कर सकती है. अब बात करते हैं कि अगर योगी को हटाते हैं तो क्या मोदी, शाह और नड्डा समेत पार्टी के किसी नेता के पास इस बात का जवाब है कि अगर वो योगी को हटाते हैं उनका विकल्प क्या है.

राहुल-अखिलेश की जोड़ी की बढ़ती ताकत के आगे बीजपी का कौन नेता है जो 2027 में पार्टी का नेतृत्व कर पाएगा. क्या सिराथू से अपना चुनाव हारने वाले और अपने काम से ज्यादा योगी के खिलाफ रणनीति बनाने और दिल्ली का चक्कर लगाने वाले डिप्टी सीएम मोर्य योगी की जगह ले पाएंगे या फिर गाहेबगाहे योगी के फैसलों की मुखालफत करने वाले दूसरे डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक? अगर यह संभव नहीं है तो योगी के अलावा दिल्ली के पास कोई रास्ता नहीं दिख रहा.

अगर फिर भी दिल्ली के नेता योगी को हटाने की रणनीति पर काम करते हैं तो यह पार्टी के लिए आत्मघाती कदम तो होगा ही दिल्ली के नेताओं को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. इधर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ पूरे फॉर्म में हैं.  वह न सिर्फ अपना बचाव कर रहे हैं बल्कि हमले भी कर रहे हैं. योगी अब लोकसभा चुनाव की हार से सीख रहे हैं और जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से फिर से पार्टी के लोगों का विश्वास फिर से बहाल करने के लिए पूरी मेहनत कर रहे हैं. अब पूरा कंट्रोल योगी ने अपने हाथ में ले लिया है ताकि 2027 में तीसरी बार जीत दिलवाई जा सके.

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