Policemen Sentenced to Death: पिता-पुत्र की हिरासत में यातना (Custodial Torture) में मौत के पांच साल बाद नौ तमिलनाडु पुलिस कर्मियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई. फैसला न्यायिक रूप से निर्णायक तो है, लेकिन यह मामला इस मुकाम तक कभी नहीं पहुंचता अगर एक रैंकिंग में निचले स्तर की अधिकारी, हेड कांस्टेबल रेवती का साहस न होता. घटना के समय रेवती थूथुकुडी जिले के सतनकुलम पुलिस स्टेशन में ड्यूटी पर तैनात थीं.
उसी स्टेशन में पुलिस अधिकारियों ने पी. जयराज और उनके बेटे जे. बेन्निक्स पर क्रूरता से अत्याचार किया था. दोनों को कोविड नियमों का उल्लंघन करते हुए अपनी मोबाइल दुकान खुली रखने के आरोप में हिरासत में लिया गया था. मामले में अप्रूवर यानि सरकारी गवाह बनकर रेवती ने मजिस्ट्रेट के सामने स्टेशन में हुई घटनाओं का ब्योरा दिया.
भले ही उन्हें अपनी सुरक्षा, परिवार या नौकरी की कोई गारंटी नहीं थी. आरोपी अधिकारी सीनियर और प्रभावशाली थे, जबकि रेवती एक जूनियर कांस्टेबल थीं. फिर भी वे अडिग रहीं. जब न्यायिक मजिस्ट्रेट एम.एस. भारतीदासन जांच के लिए पहुंचे, तब रेवती ने उनसे कहा, “सर, मैं आपको सब कुछ बता दूंगी, हर एक डिटेल, वो सच्चाई जो छुपाई जा रही है. लेकिन मैं दो छोटी बेटियों की मां हूं. क्या आप मेरी बच्चों और मेरी नौकरी की सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं?”
उसके बाद रेवती ने रात की घटना को मिनट-दर-मिनट विस्तार से बताया कि कैसे दोनों पिता-पुत्र को लगातार पीटा गया, उनको कई चोटें आईं और बाद में उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. दोनों कुछ ही दिनों में मौत हो गई, जिससे पूरे देश में आक्रोश फैल गया. रेवती ने बिना किसी डर के सीसीटीवी फुटेज में दिख रहे पुलिस कर्मियों की पहचान की, जिससे उनके मौके पर मौजूद होने का सबूत मिला. यह आपराधिक दायित्व तय करने के लिए बहुत जरूरी था.
उनकी गवाही के अनुसार, अधिकारियों ने पीड़ितों को जो भी मिला, उसी से पीटा और यहां तक कि अपने बूटों से उनके निजी अंगों पर रौंदा. बीच-बीच में वे सिर्फ शराब पीने के लिए रुकते थे. रेवती ने मजिस्ट्रेट को बताया, ''मैं स्टेशन पर लगभग रात 8:50 बजे पहुंची. उस समय अंदर से किसी के चीखने और रोने की आवाज आ रही थी. वह व्यक्ति चिल्ला रहा था, 'अम्मा, दर्द हो रहा है! मुझे छोड़ दो! प्लीज मुझे छोड़ दो! मैंने जो किया वो गलती थी!'
इसके बीच हल्की-हल्की सब-इंस्पेक्टर बालकृष्णन की आवाज भी सुनाई दे रही थी, जो स्टेशन में घुसते हुए चिल्ला रहा था, 'स्टेशन के अंदर हंगामा करने की हिम्मत की है? क्या समझ रखा है खुद को कोई बड़ा आदमी?’ जब मैं पहुंची तो वे उस व्यक्ति को बुरी तरह पीट रहे थे, वह खून से लथपथ था... कुछ देर बाद जब पीटना बंद हुआ, तो इंस्पेक्टर ने उसी घायल व्यक्ति से फर्श पर गिरा खून साफ करवाया.''
जब दोनों व्यक्ति अर्ध-बेहोश हो गए और यातना सहन नहीं कर पा रहे थे, तब रेवती ने जयराज से पूछा कि उन्हें कुछ चाहिए तो वह कॉफी ऑफर की, लेकिन अधिकारियों ने उसे तुरंत झटक दिया. एक बार जब दोनों को नंगा करके उनके हाथ बांध दिए गए, तो रेवती कमरे से बाहर चली गईं क्योंकि वह और नहीं देख पा रही थीं.
साथी अधिकारियों के चुप रहने की चेतावनियों के बावजूद, उस समय करीब 37 साल की रेवती ने बोलने का फैसला किया. पुलिस बल में यह बहुत ही असामान्य और साहसिक कदम था, जहां सहकर्मियों के खिलाफ गवाही देना दुर्लभ है. उन्हें धमकियां और दबाव झेलना पड़ा. माहौल इतना शत्रुतापूर्ण था कि मजिस्ट्रेट को पूछताछ के कमरे के बाहर गार्ड तैनात करना पड़ा, ताकि रेवती बिना डर के अपना बयान दर्ज करा सकें. फिर भी पुलिसकर्मी स्टेशन के बाहर इकट्ठा हो गए थे, टिप्पणियां कर रहे थे और कार्यवाही बाधित करने की कोशिश कर रहे थे.
इतना भयानक दबाव था कि रेवती शुरू में अपना बयान साइन करने को तैयार नहीं थीं. आखिरकार सुरक्षा की बार-बार आश्वासन के बाद उन्होंने साइन किया. न्यायाधीश भारतीदासन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, ''लंबे समय तक समझाने-बुझाने और सुरक्षा आश्वासन के बाद ही उन्होंने अपना बयान साइन किया, क्योंकि स्थिति अनुकूल नहीं थी. पूरा स्टेशन परिसर पुलिस से घिरा हुआ था, वे घटनाओं को मोबाइल में रिकॉर्ड कर रहे थे और कोर्ट स्टाफ को भी धमका रहे थे और धौंस दे रहे थे.''
मामले की शुरुआत में रेवती की गवाही को व्यापक समर्थन मिला, लेकिन वे अभी भी चिंतित रहती थीं. 2020 में 'द न्यूज मिनट' को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ''मैं वाकई नहीं चाहती कि मेरे बयान का ब्योरा सार्वजनिक हो और सीनियर अधिकारी मुझे परेशान करें.'' मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर जिला प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की. उनके और उनके पति की सुरक्षा के लिए दो पुलिस कांस्टेबल तैनात किए गए. 2020 में एक सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने फोन पर उनसे सीधे बात की और सुरक्षा का आश्वासन दिया.