नई दिल्ली: देशभर में आज क्षत्रिय शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जा रही है, लोग भारत माता के वीर सपूत महाराणा प्रताप को नमन कर रहे हैं. बता दें कि महाराणा प्रताप ने मुगलों के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ी थीं. जिनमें हल्दीघाटी का युद्ध पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. इस युद्ध में केवल 8 हजार सैनिकों के साथ महाराणा प्रताप, अकबर की सेना के खिलाफ उतरे थे. इस युद्ध का कोई परिणाम तो नहीं आया था, लेकिन मुगल सेना को भयंकर नुकसान उठाना पड़ा था. अकबर की तरफ से राजा मान सिंह ने इस युद्ध में भाग लिया था.
बहलोल खान को घोड़े समेत चीर दिया था
इसी युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप ने मुगलों के सबसे शक्तिशाली पठान कहे जाने वाले बहलोल खान को तलवार के एक ही वार से घोड़े समेत चीर दिया था, राणा के इस पराक्रम को देख कर मुगल सैनिकों में भगदड़ मच गई थी, इतिहासकारों के मुताबिक हल्दघाटी के युद्ध में महाराणा की सेना में 15 से 20 हजार सैनिक थे तो वहीं मुगलिया सेना में लगभग 80 हजार से 1 लाख सैनिक थे, इसके बावजूद मुगल सेना महाराणा प्रताप को युद्ध में हरा नहीं सकी. इसी युद्ध में महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक ने भी अपने राजा को बचाने के लिए जीवन का बलिदान दिया था.
हाथियों से भिड़ जाता था चेतक
कई इतिहासकारों का दावा है कि महाराणा प्रातप का घोड़ा चेतक भी उन्हीं की तरह वीर और पराक्रमी था, देखने में वो आम घोड़ों से कहीं ज्याद लंबा-चौड़ा और ताकतवर था. यही वजह थी कि युद्ध के दौरान चेतक के आगे धातु की सूंड नुमा चीज लगा दी जाती थी. जिसे देख कर हाथी भी अचरज में पड़ जाते थे. जब युद्ध में महाराणा प्रताप और चेतक घायल हो गए तो उस समय चेतक अपने प्राणों की चिंता ना करते हुए अपने राजा को लेकर भाग निकला, कहा जाता है कि महाराणा इस युद्ध से घायल होने के बाद भी बाहर नहीं जाना चाहते थे फिर भी चेतक उन्हें युद्ध के मैदान से निकाल ले गया. और सुरक्षित स्थान पर जाकर अपने प्राण त्यागे.
अकबर के सामने नहीं झुका था राणा प्रताप का हाथी
महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक ही नहीं बल्कि उनका हाथी रामप्रसाद भी पक्का देश भक्त था, अकबर के दत्तक पुत्र अब्दुल रहीम खानखाना ने लिखा है जब अकबर की सेना ने उसे बंदी बना लिया तो अकबर ने इस शानदार हाथी को अपनी शाही सवारी बनाने की इच्छा जाहिर की, लेकिन राम प्रसाद ने किसी भी मुगल को अपनी सवारी नहीं करने दी. और बंदी रहते हुए बना कुछ खाए-पिए, भूखे-प्यासे रह कर अपने प्राण त्याग दिये.
हल्दीघाटी के बाद भी लड़ते रहे महाराणा
महाराणा प्रताप की लड़ाई मुगलों के साथ हल्दीघाटी के युद्ध के साथ ही खत्म नहीं हुई, बल्कि इसके बाद भी वो लगातार गोरिल्ला युद्ध करके मुगलों को धूल चटाते रहे. इस दौरान उन्होंने चित्तौड़ के अलावा ज्यादातर अपने क्षेत्र को मुगलों से वापस छीन लिया था. लेकिन 29 जनवरी 1597 को शरीर पर लगी चोटों की वजह से भारत माता का ये वीर सपूत हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गया. लेकिन आज भी जब कहीं वीरता की बात होती है तो लोग महाराणा प्रताप का नाम लेना नहीं भूलते.