लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सबसे बड़ा संग्राम विभागों के बंटवारे को लेकर देखने को मिला. सत्ता के गलियारों से लेकर दिल्ली दरबार तक कई दौर की बातचीत चली, लेकिन आखिरकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दबदबा एक बार फिर कायम रहा. सूत्रों की मानें तो इस बार सबसे ज्यादा खींचतान गृह और पीडब्ल्यूडी जैसे ताकतवर मंत्रालयों को लेकर हुई. कुछ नेताओं और सत्ता के भीतर सक्रिय लॉबी ने कोशिश की कि इन अहम विभागों को मुख्यमंत्री से अलग कराया जाए, लेकिन तमाम दबाव और राजनीतिक समीकरण भी योगी की पकड़ को कमजोर नहीं कर सके.
बताया जा रहा है कि दिल्ली तक यह संदेश पहुंचाया गया कि संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाने के लिए गृह मंत्रालय और लोक निर्माण विभाग किसी दूसरे चेहरे को दिया जाना चाहिए. इसके पीछे तर्क यह रखा गया कि लगातार मजबूत होती योगी की प्रशासनिक पकड़ पार्टी के भीतर कई नेताओं को असहज कर रही है. खासकर पीडब्ल्यूडी विभाग को लेकर सबसे ज्यादा दिलचस्पी दिखाई गई, क्योंकि यही विभाग सड़क, एक्सप्रेसवे और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के जरिए राजनीतिक ताकत तैयार करता है. वहीं, गृह मंत्रालय सीधे कानून व्यवस्था और पुलिस प्रशासन पर पकड़ देता है.
लेकिन सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री योगी ने साफ संकेत दे दिया था कि सरकार की असली कमान उन्हीं के हाथ में रहेगी. यही वजह रही कि तमाम चर्चाओं और बैठकों के बाद भी गृह और पीडब्ल्यूडी मंत्रालय उनके प्रभाव क्षेत्र से बाहर नहीं जा सके. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह सिर्फ विभाग बचाने की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यूपी की सत्ता में सुपर सीएम वाली छवि बनाए रखने की जंग थी.
दिलचस्प बात यह भी है कि मंत्रिमंडल विस्तार में कई नेताओं को उम्मीद से हल्के विभाग देकर संदेश दे दिया गया कि अंतिम फैसला अभी भी योगी का ही चलता है. जिन चेहरों को बड़े मंत्रालय मिलने की चर्चा थी, वे आखिरकार प्रतीकात्मक जिम्मेदारियों तक सीमित रह गए. इससे यह भी साफ हो गया कि दिल्ली की इच्छा और लखनऊ की शक्ति के बीच इस बार पलड़ा पूरी तरह योगी के पक्ष में झुका रहा.
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि आखिर योगी का असली विरोधी कौन है. विपक्ष या फिर पार्टी के भीतर मौजूद वो चेहरे, जो उनकी लगातार बढ़ती ताकत से बेचैन हैं. मगर फिलहाल तस्वीर साफ है. गृह हो या पीडब्ल्यूडी, योगी का किला अभी भी अभेद्य बना हुआ है.