लखनऊ : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में बराबर की सीटों की मांग कर रही कांग्रेस ने विधान परिषद चुनाव में बड़ा कदम पीछे खींच लिया है. विधान परिषद की 11 सीटों पर होने वाले चुनाव में कांग्रेस ने एक भी प्रत्याशी नहीं उतारा. पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे दावेदार नामांकन की आखिरी तारीख तक इंतजार करते रहे, लेकिन अंत में उन्हें निराशा हाथ लगी.
खास बात यह है कि इनमें कई ऐसे नेता भी हैं, जो पिछले करीब 10 महीने से कांग्रेस का झंडा लेकर अपने क्षेत्रों में सक्रिय थे. मीडिया में बातचीत में 8 दावेदारों ने पार्टी के फैसले पर नाराजगी जताई. उनका आरोप है कि उन्होंने संगठन के भरोसे चुनाव की तैयारी की, कार्यकर्ताओं के बीच समय और पैसा लगाया, लेकिन ऐन वक्त पर पार्टी ने उन्हें मैदान में उतारने से ही इनकार कर दिया.
दावेदारों का कहना है कि अगर पार्टी को चुनाव नहीं लड़ना था तो उन्हें पहले ही स्पष्ट कर देना चाहिए था. आखिरी समय तक टिकट की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं के सामने अब राजनीतिक भविष्य और अपना सम्मान बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है.
कांग्रेस के इस फैसले का असर 2027 के गठबंधन की राजनीति पर भी पड़ सकता है. एक तरफ पार्टी विधानसभा चुनाव में सपा से सीट बंटवारे में मजबूत हिस्सेदारी चाहती है, वहीं दूसरी तरफ विधान परिषद चुनाव में किसी सीट पर प्रत्याशी नहीं उतारने को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
राजनीतिक जानकारों के लिए भी यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि एमएलसी चुनाव को दोनों दलों के जमीनी संगठन और आपसी तालमेल की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा था. कांग्रेस के दावेदारों की नाराजगी अब पार्टी के भीतर असंतोष को हवा दे सकती है. सवाल यही है कि 2027 में सीटों के बंटवारे की मेज पर कांग्रेस कितनी मजबूती से अपनी दावेदारी रख पाएगी.