रतन टाटा की शख्सियत कैसी थी, ये बताने की जरूरत नहीं है, सीधे-सादे और सुलझे हुए रतन टाटा हमेशा लोगों की मदद को तैयार रहते थे, चाहे वो मुंबई में साल 2008 में हुई घटना के बाद तुरंत ताज होटल के बाहर पहुंच जाना हो या अपने कर्मचारियों के लिए गैंगस्टर से भिड़ जाना. ये बात बेहद कम लोग ही जानते हैं कि रतन टाटा का मुकाबला एक बार ऐसे बदमाश से हुआ, जो किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं था, रतन टाटा चाहते तो उसे पुलिस बुलवाकर जेल में डलवा देते, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, बल्कि जो किया, उसे सुनकर आप भी सैल्युट करेंगे.
निधन से करीब एक साल पहले रतन टाटा ने खुद ये किस्सा एक इंटरव्यू में बताया था, तब उन्होंने कहा था...ये बात उन दिनों की है, जब मैं जमशदेपुर में प्लांट लगवा रहा था, वहां के गैंगस्टर को पता चला कि कंपनी के पास बहुत पैसा है, इसलिए वो हमारे कर्मचारियों को धमकी देने लगा.कई लोगों के साथ उसने मारपीट भी की, 2 हजार कर्मचारियों को अपने साथ मिलाकर उसने हमें वहां से भगाने की कोशिश की, पर मैं जब खुद वहां पहुंचा, और कई दिनों तक अपना डेरा जमाए रखा, तो उसे उल्टे पांव भागना पड़ा. क्योंकि कर्मचारी मेरे परिवार की तरह हैं.
यही वजह है कि कई बार रतन टाटा की अपनी ही कंपनी में मैनेजमेंट से भी तकरार हो गई, आज भी टाटा ग्रुप में काम करने वाले लोग खुद को बाकी कंपनियों से अलग मानते हैं. और इसकी बड़ी वजह हैं रतन टाटा, जिन्होंने हर मुश्किल वक्त में अपने कर्मचारियों का साथ दिया, ये तस्वीरें तो आपको याद ही होंगी, जब रतन टाटा ताज होटल के बाहर अचानक पहुंच गए थे, जैसे ही ख़बर मिली कर्मचारी संकट में है, होटल संकट में है, तुरंत होटल के बाहर जाकर खड़े हो गए, अंदर दुश्मनों का पूरा ग्रुप था और बाहर रतन टाटा कर्मचारियों की चिंता में अकेले खड़े थे. जबकि वहां जाने से सुरक्षाकर्मियों ने टाटा को रोका भी था. यही उनका अलग अंदाज भी था, और ये सिर्फ लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि देश पर जब-जब संकट आया, तब-तब रतन टाटा ने अपनी भूमिका देश के बेटे की तरह निभाई, चाहे वो एयर इंडिया को खरीदने की बात हो या BSNL को फिर से खड़ा करने की बात, हर वक्त रतन टाटा देश के साथ खड़े रहे, समुद्र से लेकर आसमान तक के कारोबार में रतन टाटा ने ऐसी बेहिसाब सफलता पाईं कि देश ही नहीं पूरा दुनिया उनका दीवाना हो गया, पर दो दौर ऐसे भी आए, जहां रतन टाटा को हार स्वीकारनी पड़ी है.
पहला मौका था, बॉलीवुड में एंट्री का
रतन टाटा ने फिल्म प्रोड्यूस करने का फैसला लिया, फिल्म में अमिताभ बच्चन, बिपासा बसु और जॉन अब्राहम लीड रोल में थे, फिल्म का नाम था ऐतबार. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट नहीं हो पाई, पर रतन टाटा का नाम बॉलीवुड में हाथ आजमाने के तौर पर भी जुड़ गया. जबकि दूसरा मौका था टाटा नैनो का, जो लॉन्च तो हुई, पर मार्केट में टिक नहीं पाई. इस बात का मलाल रतन टाटा को खूब रहा, पर उनकी अधूरी इच्छा इन प्रोजेक्ट को पूरा करने पर नहीं रही, बल्कि उनका अधूरा सपना कुछ और था, जो चाहकर भी वो पूरा नहीं कर पाए.
जम्मू-कश्मीर के नेता उमर अब्दुल्ला बताते हैं... साल 2012 में हमारी रतन टाटा से मुलाकात हुई थी, तब उन्होंने जम्मू-कश्मीर में आईटी, कृषि और बागवानी के क्षेत्र में निवेश की इच्छा जताई थी. लेकिन इसके पीछे रतन टाटा का मकसद सिर्फ बिजनेस नहीं बल्कि लोकल लोगों का विकास भी था, पर ये वो दौर था जब जम्मू-कश्मीर में धारा 370 लागू था, और वहां जाने से पहले कोई बिजनेसमैन 100 बार सोचता था, आज जम्मू-कश्मीर हो या जमशेदपुर हर जगह की जनता रतन टाटा को याद कर भावुक है.