नई दिल्ली: हिंदुस्तान में करीब 40 हजार रोहिंग्या और हजारों अवैध बांग्लादेशी अलग-अलग इलाकों में रहते हैं, जिन्हें निकालने की मांग बार-बार उठती है. खुद पीएम मोदी भी ये मानते हैं कि ये देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, गृहमंत्री अमित शाह ये आदेश देते हैं कि अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाए. बावजूद उसके एक भी तस्वीर रोहिंग्याओं को वापस भेजने की सामने नहीं आती, तो दोस्तों सवाल ये उठता है कि भारत एक्शन क्यों नहीं ले पा रहा? आखिर असली पेंच कहां फंस रहा है, क्या भारत में रोहिंग्या सिर्फ राजनीति का मुद्दा बनकर रह जाएंगे?
इसे समझने के लिए दो मामलों का उदाहरण ध्यान जानिए, ताकि ये समझ सकें कि इन्हें निकालने में असल दिक्कत क्या है और ये दिक्कत कब तक दूर होगी. दोनों मामले हैं साल 2021 के... म्यामांर के रहने वाले मोहम्मद सलिमुल्लाह और उनके साथियों की ओर से प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई, जिसमें कहा गया कि साल 2011 में म्यामांर में भड़की हिंसा के बाद मोहम्मद सलीमुल्लाह और उनके साथी भागकर हिंदुस्तान आ गए. नई दिल्ली, हरियाणा, प्रयागराज और जम्मू-कश्मीर समेत कई इलाकों में जिसे जहां जगह मिली वो रुक गया. अब सरकार इन्हें वापस भेजना चाहती है, पर वहां की सेना इन्हें मार देगी. भारत के संविधान की धारा 19 के तहत इन्हें राहत दी जाए.
धारा 19 के क्लॉज 1 का सबक्लॉज डी निर्वासित न होने का अधिकार देता है. जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को आदेश देने से इनकार कर दिया, पर जम्मू-कश्मीर से पकड़े गए 168 शरणार्थियों को ये कहते हुए राहत दे दी कि तय प्रक्रिया का पालन किए बिना सरकार इन्हें म्यांमार नहीं भेज सकती. वहां की सरकार ने फॉरेन एक्ट के तहत 168 रोहिंग्याओं को कठुआ के हीरानगर जेल में होल्डिंग सेंटर बनाकर इन्हें रखा है.
अब सवाल उठता है तय प्रक्रिया क्या होगी. तो इसे समझने के लिए दूसरा उदाहरण सुनिए, दूसरा मामला है महाराष्ट्र के रहने वाले पत्रकार और समाजसेवी रहमत खान से जुड़ा, जिन्हें मदरसों में चल रहे अवैध करतूतों और अवैध फंडिंग की जानकारी आरटीआई से मांगी और फिर उसकी शिकायत कलेक्टर से की तो, मदरसा संचालकों ने इन पर मुकदमा दर्ज करवा दिया और अमरावती पुलिस ने रहमत खान को नोटिस तक जारी कर दिया और पूछा क्यों न आपको जिला बदर कर दिया जाए. आखिर में रहमत खान सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तब जाकर राहत मिली.
आज महाराष्ट्र भी रोहिंग्याओं का बड़ा गढ़ बनता जा रहा है, फिर भी कुछ मुस्लिम प्रेमियों की आड़ में रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों का पाप छिपाया जा रहा है. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तक पर इन्हें खुलेआम मदद देने के आरोप लगते हैं. खबर यहां तक है कि बंगाल के रास्ते हिंदुस्तान में घुसने वाले इन शरणार्थियों की मदद खुलेआम ममता सरकार करती है.
कई नेता और स्थानीय लोग इन्हें न सिर्फ रहने और खाने-पीने का सामान देते हैं, बल्कि यहां की महिला से शादी करवाकर इनका आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड भी बनवा देते हैं, और फिर इनका चुनावी फायदा कुछ पार्टियों को मिलता है, लेकिन जहां ये बसाए जाते हैं वहां की डेमोग्राफी कुछ ही सालों में बदल जाती है, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है झारखंड, जहां के सांसद निशिकांत दूबे ने संसद मे जब बताया कि कुछ ही सालों में एक इलाके में अचानक से मुस्लिम आबादी बेतहाशा बढ़ गई तो पूरा सदन सुनकर दंग रह गया.
अब आपके दिमाग में ये सवाल उठ रहा होगा कि बीजेपी के सांसद जब जमीनी हकीकत देखकर गुस्से में हैं, पुलिस के पास रोहिंग्याओं के कारनामों की पूरी कुंडली है, राज्यपालों और उपराज्यपालों के पास अपने राज्य में होते डेमोग्राफी चेंज की पूरी रिपोर्ट है, पीएम मोदी और अमित शाह खुद इन्हें देश से निकालना चाहते हैं तो फिर ये निकाले क्यों नहीं जा रहे, तो इसकी चार बड़ी वजह है.
पहली वजह- रोहिंग्याओं को भेजा कहां जाए, ये तय करना मुश्किल है, क्योंकि अमेरिका ने जैसे भारतीयों की लिस्ट भेजी और कहा इतने अवैध भारतीय हमारे यहां है तो भारत ने कहा भेज दीजिए, वैसे म्यांमार इन्हें अपना नागरिक मानने को तैयार नहीं है, इसलिए इस बात पर भी मंथन जारी है. म्यांमार से रिश्ते बेहतर होना भारत की नॉर्थ ईस्ट पॉलिसी के लिए बेहद अहम है, इसलिए सख्ती की बजाय बातचीत का रास्ता ढूंढा जा रहा है.
दूसरी वजह- सरकार के पास अभी ये स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है कि भारत के किस हिस्से में कितने रोहिंग्या हैं, इसका रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है, उसके बाद जिन्होंने फर्जी दस्तावेज के जरिए नागरिकता हासिल की होगी, उनकी नागरिकता रद्द की जाएगी, फिर एक्शन होगा, इसमें वक्त लगेगा.
तीसरी वजह- सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है तय प्रक्रिया का पालन करना होगा, जबकि अमेरिका में पहले से ही ये नियम है कि जिसने भी अवैध तरीके से नागरिकता ली है, या अवैध तरीके से देश में घुसा है, उसे तुरंत निकाला जा सकता है, इसलिए भारत अमेरिका की तर्ज पर एक्शन नहीं ले पा रहा है.
चौथी वजह- रोहिंग्याओं के बस्ती की पानी-बिजली जब जम्मू-कश्मीर में काटी गई तो तुरंत वहां के सीएम उमर अब्दुल्ला को मानवता की याद आ गई, हमारे देश में कुछ ऐसे रोहिंग्या प्रेमी बैठे हैं, जिन्हें भारत सरकार के एक्शन पर इंसानियत याद आती है, जबकि रोहिंग्याओं से पत्थऱ फेंकवाने और अपराध करवाने के वक्त उन्हें राष्ट्र की सुरक्षा का ख्याल नहीं रहता.
जानकार बताते हैं कि मोदी सरकार जल्द ही इससे जुड़ी कोई नीति ला सकती है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र भले ही भारत को ये कहे कि रोहिंग्याओं को आपको अपने देश में रखना चाहिए, पर भारत ने 1951 के यूनाइटेड नेशंस रिफ्यूजी कन्वेंशन और 1967 के प्रोटोकॉल पर साइन नहीं किया है. इसलिए रोहिंग्याओं को अपने यहां रखने के लिए बाध्य नहीं है और जल्द ही इनके निर्वासन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, जो कई पार्टी के नेताओं के लिए बड़ा सियासी झटका होगा, जबकि बीजेपी को ये फैसला बंपर फायदा पहुंचा सकता है, इसीलिए आपने देखा होगा बीते कुछ ही महीने में कभी दिल्ली तो कभी लखनऊ से कई बांग्लादेशी पकड़े गए हैं.