जो अखिलेश यादव युवाओं को सरकारी नौकरी देने का वादा कर रहे हैं, जो पुलिस लाठीचार्ज की तस्वीरें शेयर कर लिखते हैं भाजपा जाए तो नौकरी आए....उनके कालखंड की हकीकत अगर युवा सही से सुन ले तो समझ जाए कि नौकरियों का स्वर्णिम काल सपा के सत्ता में रहते तो बिल्कुल नहीं आ सकता....इसके तीन बड़े उदाहऱण आपके सामने हैं....ये हैं अनिल यादव...जिन्हें अखिलेश सरकार में UPPSC का चेयरमैन बनाया गया था, जिनकी मनमानी के खिलाफ याचिका हाईकोर्ट पहुंची.
अदालत ने साफ पूछा, '' 83 उम्मीदवारों के आवेदन सरकार के पास आए थे, फिर सबको दरकिनार कर 83वें नंबर पर आने वाले मैनपुरी स्कूल के प्रिंसिपल अनिल यादव को चेयरमैन कैसे बना दिया गया ? इनके खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी क्यों नहीं दी गई ? जानकारी छिपाने की कोशिश क्यों हुई ? आगरा के रहने वाले अनिल यादव का वैरिफिकेशन मैनपुरी से क्यों करवाया गया, डीएम से लेकर लेखपाल तक ने एक ही दिन वो भी रविवार को हस्ताक्षर किए हैं.''
अदालत में अखिलेश सरकार के वकील सही जवाब नहीं दे पाए, नतीजा अनिल यादव की तो नौकरी गई ही, साल 2017 में जब योगी आदित्यनाथ सत्ता में आए तो उन्होंने सबसे अखिलेशराज में हुए 600 से ज्यादा भर्तियों की जांच के आदेश दे दिए, सीबीआई ने कई फाइलें खंगाली, और फिर रोजाना अखबार में नई-नई रिपोर्ट आने लगी, पता ये तक चला कि प्रदेश के ज्यादातर थानों में जानबूझकर यादव दारोगा और पुलिस ऑफिसर की ड्यूटी लगाई गई है.
शिक्षा बोर्ड से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक के सिस्टम में अखिलेश यादव ने MY समीकऱण को तवज्जो देते हुए नौकरियां बांटी. नतीजा अखिलेश सरकार में बांटी गई कई नौकरियां अदालत को रद्द करनी पड़ी, और भ्रष्टाचार के आरोपों का कोई ठिकाना ही नहीं था. जानकार कहते हैं सैफई से ही पूरी सत्ता कंट्रोल होती थी, और यूपी के कई विभाग यादवमय हो गए थे...
हालांकि इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं था कि बाकी जातियों को नौकरियां नहीं मिलती थी, पर उनका प्रतिशत कम था...हैरानी तो तब होती है जब इसी साल अर्पित सिंह नाम के व्यक्ति का एक केस खुलकर सामने आता है...एक ही नाम का व्यक्ति 6 जगहों पर 9 साल तक नौकरी करता है, सरकार से करीब 4.5 करोड़ रुपये की सैलरी लेता है, और किसी को भनक तक नहीं लगती, पर योगी सरकार में उसकी पोल खुल जाती है...जैसे ही केस सामने आता है, अखिलेश यादव भी योगी सरकार पर हमलावर होने की कोशिश करते हैं, पर योगी आदित्यनाथ जब पुरानी फाइलें खंगलवाते हैं तो अखिलेश कंफ्यूज हो जाते हैं कि अब सवाल खुद पर कैसे उठाए, क्योंकि ये मामला उनके कार्यकाल के दौरान का था...
ये उस एफआईआर की कॉपी है, जो अर्पित सिंह नाम के व्यक्ति के खिलाफ दर्ज हुई है. जिसमें साफ-साफ लिखा गया है कि साल 2016 में एक्सरे-टेक्नीशियन के पद पर कथित अर्पिंत सिंह नाम से 6 जिलों में नौकरी ली गई.
इन जिलों में फर्रुखाबाद, बांदा, बलरामपुर, बदायूं, रामपुर और शामली शामिल हैं...अब इन जगहों से सैलरी कैसे जारी हो रही थी, इसकी जगह नौकरी कौन कर रहा था, और फोटो से ये बात पता क्यों नहीं चल रही थी, क्या ऊपर के अधिकारी भी इसमें मिले हुए थे, ऐसे कई सवाल इस केस के सामने आने के बाद लोगों के मन में उठे...
जो युवा नौकरी की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें भी ये सुनकर बेहद धक्का लगा कि वो दिन-रात पढ़ाई कर नौकरी नहीं ले पा रहे हैं, और कुछ लोग सत्ता से नजदीकी का ऐसे नाजायज फायदा उठा रहे हैं...यानि जो अखिलेश यादव ये सोच रहे हैं कि नौकरी के नाम पर युवाओं को साध लूंगा, 2027 का सत्ताधीश बन जाऊंगा, उनके लिए सपा के पापों को छिपाना मुश्किल हो सकता है...