सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन: भारतीय न्याय व्यवस्था के भविष्य पर हुई गहन चर्चा

Amanat Ansari 24 Mar 2026 01:19: PM 3 Mins
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन: भारतीय न्याय व्यवस्था के भविष्य पर हुई गहन चर्चा

बेंगलुरु: सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने 21-22 मार्च 2026 को JW मैरियट बेंगलुरु प्रेस्टीज गोल्फशायर रिसॉर्ट एंड स्पा में अपना पहला राष्ट्रीय सम्मेलन ''न्यायिक शासन का पुनर्मूल्यांकन: लोकतांत्रिक न्याय के लिए संस्थानों का सुदृढ़ीकरण'' विषय पर आयोजित किया. इस दो दिवसीय सम्मेलन में न्यायपालिका के वरिष्ठ न्यायाधीशों, वरिष्ठ अधिवक्ताओं, नीति-निर्माताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया.

इस दौरान भारतीय न्याय व्यवस्था के भविष्य पर गहन चर्चा हुई. सम्मेलन का उद्घाटन माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ (सुप्रीम कोर्ट), SCBA अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह, उपाध्यक्ष राहुल कौशिक और सचिव प्रज्ञा बघेल द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ. श्री राहुल कौशिक ने स्वागत भाषण दिया, जबकि विकास सिंह ने अध्यक्षीय संबोधन में न्यायिक सुधारों और संस्थागत मजबूती के प्रति SCBA की प्रतिबद्धता पर जोर दिया. न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने उद्घाटन भाषण में तेजी से विकसित हो रहे लोकतंत्र में संतुलन, अखंडता और न्यायिक स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित किया.

पहले दिन चार तकनीकी सत्र आयोजित हुए

  • सत्र-I: न्याय को वास्तविक बनाना – मध्यस्थता की परिवर्तनकारी भूमिका (अध्यक्ष: राहुल कौशिक): पूर्व महान्यायवादी मुकुल रोहतगी, वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पांचू, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने भाग लिया. चर्चा में मध्यस्थता को बढ़ावा देने, मुकदमेबाजी संस्कृति कम करने और 'हाइब्रिड विशेषज्ञ निर्णय मॉडल' जैसे प्रस्तावों पर जोर दिया गया. न्यायमूर्ति नाथ ने बताया कि ''राष्ट्र के लिए मध्यस्थता'' कार्यक्रम के तहत 11 लाख से अधिक मामले संदर्भित किए जा चुके हैं.
  • सत्र-II: लंबित मामलों से त्वरित न्याय तक: ईएसी-पीएम सदस्य संजीव सान्याल, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति एन. कोटेश्वर सिंह और न्यायमूर्ति मनमोहन ने भाग लिया. न्यायिक बैकलॉग, प्रणालीगत अक्षमताओं, बहु-सदस्यीय न्यायिक सुधार आयोग और प्रशासनिक समर्थन की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा हुई.
  • सत्र-III: लोकतांत्रिक न्याय के लिए समावेशी संस्थान – महिलाओं की भागीदारी: SCBA के अग्रणी सर्वेक्षण का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया. विकास सिंह ने बार चुनावों में महिलाओं के लिए 30% आरक्षण और बेंच पर समान प्रतिनिधित्व की सराहना की. उन्होंने ''गुमनाम'' महिला वकीलों (जो रिसर्च, ड्राफ्टिंग और रणनीति संभालती हैं) को मान्यता देने का प्रस्ताव रखा. न्यायमूर्ति सुमिता कांत, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और अन्य वक्ताओं ने मातृत्व सहायता, बाल देखभाल केंद्र और सांस्कृतिक परिवर्तनों पर जोर दिया.
  • सत्र-IV: पहली पीढ़ी के वकील और न्याय तक पहुंच: न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति हरिश रंधावा ने युवा वकीलों की चुनौतियों, मेंटरशिप, वित्तीय सहायता और ''तीन H'' (कठोर परिश्रम, विनम्रता, ईमानदारी) पर चर्चा की.

दूसरे दिन दो महत्वपूर्ण सत्र हुए

  • सत्र-V: न्यायिक शासन और AI पर वैश्विक परिप्रेक्ष्य (न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जोज मसीह, न्यायमूर्ति डी.के. उपाध्याय आदि): AI की न्यायिक दक्षता बढ़ाने वाली भूमिका पर चर्चा हुई, लेकिन यह मानवीय निर्णय का स्थान नहीं ले सकता, यह बात जोरदार तरीके से कही गई.
  • सत्र-VI: विकसित भारत में न्यायपालिका की भूमिका: न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूयान, मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार, आर. वेंकटरमणि और अन्य वक्ताओं ने न्यायिक स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और 2047 के विकास लक्ष्यों में न्यायपालिका की भूमिका पर प्रकाश डाला.

सम्मेलन के दौरान SCBA और कॉमनवेल्थ लॉयर्स एसोसिएशन (CLA) के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए. ''इंडिया’s Constitutional Odyssey: 75 Years of Global Reach'' पुस्तक का प्री-रिलीज भी हुआ.

समापन और भविष्य की प्रतिबद्धता

समापन सत्र में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने SCBA की सराहना की और कहा कि चर्चाएं केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि कार्रवाई योग्य सुधारों का मार्गदर्शन करेंगी. विकास सिंह ने सभी भाषणों को लिपिबद्ध कर एक विशेष पुस्तिका प्रकाशित करने की घोषणा की. राहुल कौशिक ने इसे लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करने का ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया. SCBA ने न्यायिक सुधारों को रचनात्मक रूप से लागू करने के लिए न्यायपालिका, बार और नीति-निर्माताओं के साथ निरंतर सहयोग की प्रतिबद्धता दोहराई. यह सम्मेलन न केवल कानूनी जगत के नेतृत्व को प्रदर्शित करता है, बल्कि न्याय प्रणाली को अधिक समावेशी, दक्ष और जनता के विश्वास योग्य बनाने की दिशा में एक नया मानदंड स्थापित करता है.

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