नई दिल्ली: भोपाल के कुटुंब न्यायालय में एक ऐसा समझौता हुआ है, जो रिश्तों की जटिलताओं और व्यावहारिक फैसलों की मिसाल बन गया है. यह मामला 90 के दशक की फिल्म 'जुदाई' की याद दिलाता है, जहां प्यार और पैसों का खेल चलता है, लेकिन यहां कहानी थोड़ी अलग और ज्यादा वास्तविक है. एक केंद्रीय सरकारी विभाग में तैनात 42 साल के शादीशुदा अधिकारी का अफेयर अपनी ही ऑफिस में काम करने वाली 54 साल की महिला सहकर्मी से शुरू हुआ.
उम्र में 12 साल बड़ी होने के बावजूद दोनों के बीच गहरा रिश्ता बन गया. धीरे-धीरे घर में तनाव बढ़ता गया. झगड़े, बहसें और घर का माहौल बिगड़ता चला गया. इस सबसे ज्यादा असर दो बेटियों पर पड़ा, जो एक 16 साल की और दूसरी 12 साल की. बड़ी बेटी ने हिम्मत जुटाकर मामले को कुटुंब न्यायालय तक पहुंचाया. कोर्ट में काउंसलिंग के कई सत्र हुए. पति ने साफ कह दिया कि वह अपनी पत्नी के साथ नहीं रह सकता और उसे मानसिक शांति केवल अपनी सहकर्मी के साथ मिलती है.
जब रिश्ता बचाना नामुमकिन लगने लगा, तो पत्नी ने एक व्यावहारिक और मजबूत रुख अपनाया. उसने तलाक के बदले कुछ शर्तें रखीं. बेटियों के भविष्य, शिक्षा और सुरक्षित जीवन के लिए एक डुप्लेक्स मकान, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 1.23 करोड़ और 27 लाख रुपए नकद. कुल मिलाकर यह रकम लगभग 1.5 करोड़ के आसपास पहुंचती है.
आश्चर्यजनक रूप से प्रेमिका ने इन शर्तों को बिना हिचकिचाहट के मान लिया. उसका कहना था कि वह प्रेमी के परिवार को बेसहारा नहीं छोड़ना चाहती. इसलिए उसने अपनी जमा-पूंजी और संपत्ति का बड़ा हिस्सा इस समझौते में लगा दिया. काउंसलर्स का मानना है कि जब भावनाएं पूरी तरह खत्म हो जाएं और साथ रहना सिर्फ बोझ बन जाए, तो जबरदस्ती रिश्ता निभाने से बेहतर है कि सम्मानजनक तरीके से अलगाव हो. यह फैसला समाज को भले अजीब लगे, लेकिन बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से यह एक समझदारी भरा कदम साबित हुआ.
आखिरकार, लंबी काउंसलिंग के बाद तीनों पक्षों की सहमति से यह समझौता हुआ और वैवाहिक रिश्ते का अंत आपसी सहमति से तय हो गया. यह कहानी बताती है कि कभी-कभी प्यार की कीमत सिर्फ भावनाओं में नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों और बच्चों के भविष्य में भी तय होती है.