जब भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कोई खास व्यक्ति मिलता है, तो कुछ न कुछ खास गिफ्ट देता है, जैसे ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाले शरद कुमार ने मोदी को 9 लाख की टोपी गिफ्ट की थी. हाई जंप में सिल्वर जीतने वाले निशाद कुमार ने 8 लाख का जूता गिफ्ट किया था, और नीरज चोपड़ा ने लाखों का भाला मोदी को तोहफे में दिया था, यहां तक किसी राष्ट्राध्यक्ष से भी मोदी मिलते हैं तो वो इंडिया की संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी तोहफा देते हैं, और वहां के राष्ट्राध्यक्ष मोदी को गिफ्ट देते हैं, लेकिन ये इतिहास में शायद पहली बार है जब तिहाड़ जेल में बंद किसी कैदी ने मोदी को गिफ्ट भेजवाया है,
और वो कैदी कौन है, ये बताएं उससे पहले उसके खास गिफ्ट की तस्वीरें देखिए, जिसे हाथों में लिए खड़े हैं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना वो मोदी की ओर जैसे ही ये खास पेंटिंग बढ़ाते हैं, उसे मोदी कुछ देर तक निहारते हैं, चूंकि गिफ्ट हाथ में लेने के तुरंत बाद वो अपने पास के लोगों को पकड़ा देते हैं, एसपीजी कमांडो उसे खास जगह रखवा देते हैं, उसके बाद केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय उनमें से कई गिफ्ट की नीलामी करती हैं, लेकिन यहां मोदी ने तुरंत गिफ्ट देने की बजाय उसे हाथों में होल्ड कर देखा, जिसके बाद कई लोग ये समझना चाह रहे हैं कि आखिर इसमें ऐसा क्या खास है, और इसे एक कैदी ने कैसे बनायाा.
तस्वीर को गौर से देखने पर पता चलता है, इसमें मोर की पेंटिंग बनी हुई है. जिसके दो मायने हैं, पहला मोर राष्ट्रीय पक्षी है, और दूसरा मोर से मोदी का खास लगाव है, आपने वो तस्वीर भी देखी होगी, जिसमें मोदी मोर को दाना खिलाते नजर आ रहे थे, जिस पर कुमार विश्वास ने तंज कसते हुए कहा था विपक्षियों वंस मोर, इस पर खूब सियासत भी हुई थी, लेकिन हम आपको सियासत से हटकर जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई दिखाते हैं, कैसे जेल की चाहरदीवारियों के भीतर जाकर कुछ कैदी और खतरनाक बन जाते हैं, जबकि कुछ कैदी खुद को पेंटिंग, योग और अध्यात्म जैसे कामों में लगा देते हैं, और ये मोर की पेंटिंग उसी की निशानी है. जिसका सबसे बड़ा उदाहरण तिहाड़ जेल की इन चाहरदीवारियों पर देखने को मिलता है, जहां रहने वाली महिला कैदियों की लिखी एक लाइन तिहाड़ जाने वाले हर कैदी की ध्यान खींचती है, वहां दीवारों पर लिखा है.
सुबह लिखती हूं, शाम लिखती हूं, इस चारदीवारी में बैठी जब से, बस तेरा नाम लिखती हूं, इन फासलों में जो गम की जुदाई है, उसी को हर बार लिखती हूं...
ये लाइन किसी शायर ने नहीं, बल्कि तिहाड़ जेल की सेल नंबर 6 में बंद महिला कैदी ने लिखी थी, जो अपने पति के विरह को कलम के जरिए बयां करती है, क्योंकि कई महिलाएं ऐसी हैं, जिनके पति उसी तिहाड़ या मंडोली जेल में बंद हैं, जहां वो बंद हैं, पर उनकी मुलाकात नहीं हो पाती, चूंकि हमारे देश में जेल को सुधारगृह का दर्जा दिया गया है, इसलिए वहां बंद कई कैदियों को उनकी रूचि के हिसाब से उन्हें पढ़ने-लिखने, सीलाई-कढ़ाई, पेंटिंग और तमाम चीजें सीखाई जाती हैं.
आप ये जानकर शायद दंग रह जाएं कि दिल्ली की तिहाड़, मंडोली और रोहिणी जेल में बंद कैदियों की बनाई पेंटिंग बकायदा एग्जिबिशन में लगाई जाती है, और ये तस्वीरें उसी की हैं. ऐसे में ये समझना भी जरूरी हो जाता है कि आखिर मोदी के लिए जिसने पेंटिंग बनाई, वो कैदी कौन है. जिस तिहाड़ जेल के नाम से हमारे दिमाग में बंद कोठरी, अंधेरे कमरे और यातना की तस्वीरें उभर आती है, उस तिहाड़ का एक आर्ट स्कूल भी है, और वहां काम कर कैदी लाखों कमाते हैं, आप शायद ये जानकर दंग रह जाएं कि
आर्ट गैलरी से सुसज्जित तिहाड़ स्कूल ऑफ आर्ट ने अपनी स्थापना से लेकर अब तक 60 कलाकृतियां बेची हैं जिनसे पांच से छह लाख रुपये मिले हैं. जिनमें से हर कलाकृति की बिक्री से मिलने वाली आधी रकम संबंधित कैदी के खाते में जमा करवा दी जाती है और बांकी कला संबंधी कार्यकलापों पर खर्च की जाती है. भारत कला महोत्सव में कैदियों की कलाकृतियों के प्रदर्शन के लिए एक बूथ है.
ऐसे ही किसी बूथ पर वो पेंटिंग पहले पहुंची होगी, या फिर इसे उन पेंटर कैदियों से बनवाया गया होगा, जो कभी अपराध की दुनिया के शहंशाह थे और अब पेंटिंग की दुनिया के बादशाह बनना चाहते हैं. सीजेआई तक ये पेंटिंग कैसे पहुंची ये बात सामने नहीं आई, लेकिन इतना जरूर पता चला है कि तिहाड़ जेल में बंद कैदी ने इसे कई दिन लगाकर तैयार किया है, इसके लिए उसे सारे सामान मुहैया करवाए गए थे, और जब शानदार पेंटिंग बनकर तैयार हो गई, तो उसे सीजेआई तक पहुंचाया गया और फिर मोदी को तोहफे के रूप में मिला, जो अब पीएमओ की शोभा बढ़ाएगा.
बड़ी बात ये है कि ये पहल सिर्फ तिहाड़ में नहीं बल्कि देश के बाकी जेलों में चलाई जा रही है, उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिला जेल से बीते दिनों एक तस्वीर सामने आई थी, जिसमें आचार्य प्रवर देवव्रत महाराज कैदियों को प्रभु श्रीकृष्ण और श्रीराम की कथा सुना रहे थे, जिनमें से कईयों को कथा सुनने के बाद अपने किए पर पछतावा हो रहा था, तो कई कैदी ऐसे थे, जो जेल की चाहरदीवारी से बाहर निकलकर सुकून की जिंदगी जीना चाहते हैं, लेकिन कहते हैं एक बार अपराध के दलदल में फंस जाने के बाद वापसी की गुंजाइश काफी कम होती है, किसी को हालात अपराधी बना देता है, तो किसी का गुस्सा उस पर हावी हो जाता है, और फिर नसीब होती है वही काली कोठरी, जिसे लॉरेंस बिश्नोई जैसे लोग अपना घर मान लेते हैं, तो वहीं कुछ पेंटर और कलाकार बन जाते हैं.