क्या अचानक BJP ज्वाइन कर लेंगे रविंद्र भाटी? ये ख़बर राजस्थान में किसने फैलाई, समर्थकों को चिंता सताई!

Global Bharat 18 Apr 2024 08:08: PM 3 Mins
क्या अचानक BJP ज्वाइन कर लेंगे रविंद्र भाटी? ये ख़बर राजस्थान में किसने फैलाई, समर्थकों को चिंता सताई!

जहां देखिए वहां भाटी, सोशल मीडिया पर भाटी...ज़मीन पर भाटी का नाम....बाड़मेर का ये भाटी आखिर कौन है जिसकी रैली में शाहरूख,सलमान के शो से ज्यादा भीड़ आती है! जब 26 साल के योगी थे तब उनके आस-पास भी इतनी भीड़ नहीं आती थी....नरेंद्र मोदी भी उस वक्त सामान्य नेता थे, फिर रविंद्र भाटी के पास ऐसा क्या है जो इतनी भीड़ बुला लेते हैं जिसका राज़ पता करने के लिए राजस्थान पुलिस, LIU के साथ केंद्र के कई अधिकारी लगे हैं! रॉबिन हुड जैसी छवि...बाड़मेर के बॉर्डर से निकलता नाम...बीजेपी, कांग्रेस के लिए मुसीबत, पर भीड़ का मसीहा कैसे बने रविंद्र भाटी

ये नरेंद्र मोदी की रैली की भीड़ है, और ये रविंद्र भाटी की रैली की भीड़ है....दोनों में से किसकी रैली में ज्यादा भीड़ है.....ये तेजस्वी यादव की रैली की भीड़ है, ये रविंद्र भाटी के लिए एकजुट हुई भीड़ है! बताइए तेजस्वी यादव या फिर भाटी किसकी रैली में ज्यादा भीड़ है! ये अखिलेश यादव की रैली में भीड़ है और ये भाटी की रैली की भीड़ है...बताइए किसकी रैली में सबसे ज्यादा भीड़ है! एक शिक्षक का बेटा, पहले आसानी से विधायक बनता है, न लॉलीपॉप देता है, न कोई बड़ा वादा करता है, फिर बाड़मेर की जनता का हीरो क्यों बनता है? तो हम आपको सवालों का जवाब देते हैं, एक 26 साल का लड़का कैसे जनता की नजरों में हीरो बन जाता है!

गहलोत सरकार के समय एक ऑडिटोरियम बनाने के लिए विश्वविद्यालय की 37 बीघा भूमि अधिग्रहण की जाने लगी तो भाटी ने इसका ज़बरदस्त विरोध किया. उनका तर्क था कि 1200 करोड़ रुपए मूल्य की ये भूमि विश्वविद्यालय की है. इसे जेडीए कैसे ले सकता है. सरकार नहीं मानी तो उन्होंने विधानसभा के बाहर विशालकाय प्रदर्शन किया और मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र में सरकार के लिए एक बड़ी सिरदर्दी पैदा कर दी. इस आंदोलन ने भाटी को राज्य स्तरीय पहचान दे दी. यही से जनता के हीरो बन गए और वहां भाटी-भाटी का नारा गूंजने लगा, राजस्थान में एक नारा चल रहा है, दाल बांटी चूरमा, रविंद्र भाटी बाड़मेर का सूरमा.

विधानसभा चुनाव में रविंद्र भाटी के साथ बीजेपी ने बहुत बड़ा धोखा किया था, बीजेपी नेताओं को इस बात का डर था कि अगर वो बीजेपी से चुनाव लड़े और चुनाव जीत गए तो फिर जोधपुर के नेताओं की कुर्सी हिल जाती. दो सीटों से चुनाव लड़ने की मांग भाटी ने की थी, लगभग पक्की भी बात हो गई थी लेकिन बीजेपी के नेताओं ने ही भाटी का विरोध किया, और अब भाटी ही अपना बदला पूरा करना चाहते हैं! एक सीट थी सरदारपुरा, जहां से पिछली सरकार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लड़ रहे थे और दूसरी थी शिव, जहां से बीजेपी के कई दावेदार थे. भाटी को न तो सरदारपुरा से टिकट दिया गया और न ही शिव से. बीजेपी के एक नेता बताते हैं,

"सरदारपुरा से उन्हें टिकट दिया जा रहा था; लेकिन इसका विरोध इस कारण हुआ कि इससे इस लड़के की छवि पूरे देश में बन जाएगी और यह जोधपुर में कुछ नेताओं के लिए एक नया सिरदर्द हो जाएगा. एक डर ये भी था कि मोदी नया विकल्प मिलते ही, किसी का भी टिकट काट देते हैं तो रवींद्र के बाद तो स्थिति बदल ही जाएगी…"

एक बार भाटी से मीडिया ने पूछा क्या आप बीजेपी में शामिल होना चाहते थे या होंगे तो जो जवाब मिला था उसी में सारी कहानी छिपी है! भाटी बताते हैं

"उनके मन में सरदारपुरा से चुनाव लड़ने की बहुत इच्छा थी; लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने टिकट नहीं दिया. भाजपा के कुछ नेता भाटी को एक दायरे में ही रखने के पक्ष में थे; लेकिन उनकी इस जुगत ने भाटी को उस बॉल की तरह उछाल दिया, जो दबाने पर प्रतिक्रिया में अधिक उछलती है…."

'रन फॉर रेगिस्तान' और 'जनसंवाद' जैसी यात्राओं ने भी उन्हें आम लोगों तक पहुंचने में मदद की. भाटी के साथ काम करने वाले कार्यकर्ता कहते हैं कि वो बंदा जब मिशन पर लगता है तो न सोता है ना सोने देता है, वो किसी भी सरकार को पीछे हटने पर मजबूर कर देतें हैं! ट्विटर, फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम के माध्यम से भाटी की लोकप्रियता शहर और गांवों के साथ-साथ जाति और धर्म के दायरों को लांघ गई है. बाड़मेर के सुदूर गांवों में लड़के-लड़कियां आधी रात को भाटी के लिए रील बनाकर पोस्ट करते हैं. कह दो राजनीतिक के उस्तादों से कोई एक बच्चा आएगा...मैदान मार कर जाएगा...क्योंकि कई बार वरगद के पेड़ को तूफान उखाड़ देता है और छोटे से पेड़ को तूफान छूकर चला जाता है!

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