ABVP ने आखिरकार वामपंथियों के गढ़ JNU में लगाई सेंध, दर्ज की बड़ी जीत

Amanat Ansari 28 Apr 2025 07:31: PM 2 Mins
ABVP ने आखिरकार वामपंथियों के गढ़ JNU में लगाई सेंध, दर्ज की बड़ी जीत

नई दिल्ली: नई दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), जो लंबे समय से वामपंथी विचारधारा का गढ़ रहा है, अब एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है. हाल ही में हुए JNU छात्रसंघ (JNUSU) चुनावों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की छात्र शाखा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने ऐतिहासिक सफलता हासिल की है. यह पहली बार है जब JNU जैसे वामपंथी प्रभाव वाले कैंपस में ABVP ने इतनी बड़ी जीत दर्ज की है.

हालांकि वामपंथी गठबंधन ने छात्रसंघ के चार प्रमुख पदों (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव, और संयुक्त सचिव) में से कुछ महत्वपूर्ण पद जीते, लेकिन ABVP ने काउंसलर सीटों पर जबरदस्त प्रदर्शन किया. JNU में कुल 42 काउंसलर सीटें हैं, जो 16 स्कूलों और विशेष केंद्रों में बंटी हैं. इनमें से ABVP ने 23 सीटें जीतीं, जो किसी भी छात्र संगठन द्वारा जीती गई सबसे ज्यादा सीटें हैं. यह जानकारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता अमित मालवीय ने साझा की.

ABVP ने खास तौर पर स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज और स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में भी अपनी मौजूदगी दर्ज की, जहां लंबे समय से वामपंथी छात्र संगठनों का दबदबा था. इन दोनों स्कूलों में ABVP ने 5 में से 2 सीटें जीतीं. खास बात यह है कि स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में ABVP ने 25 साल बाद सीट जीती है. चार प्रमुख पदों में से ABVP के वैभव मीणा ने संयुक्त सचिव का पद जीता.

यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि 2015-16 के बाद यह पहली बार है जब ABVP ने छात्रसंघ के केंद्रीय पैनल में कोई पद हासिल किया है. उस समय सौरव शर्मा ने संयुक्त सचिव का पद जीता था. इसके अलावा, 2000-01 में ABVP के संदीप महापात्रा ने JNUSU का अध्यक्ष पद जीता था, जो उसका आखिरी बड़ा मौका था. इस बार के चुनाव में उपाध्यक्ष और महासचिव के पदों पर ABVP के उम्मीदवारों ने वामपंथी गठबंधन के खिलाफ कांटे की टक्कर दी. उपाध्यक्ष पद पर ABVP सिर्फ 34 वोटों से और महासचिव पद पर 114 वोटों से हारी. ABVP की JNU इकाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, "इतिहास रचा गया है, और यह सिर्फ शुरुआत है."

JNU छात्रसंघ में केंद्रीय पैनल (चार प्रमुख पद) के अलावा काउंसलर होते हैं, जो सभी प्रस्तावों को मंजूरी देने की शक्ति रखते हैं. 23 काउंसलर सीटों के साथ ABVP का प्रभाव अब छात्रसंघ के फैसलों पर काफी बढ़ेगा. ABVP की इस जीत को JNU में उसकी लगातार बढ़ रही मौजूदगी का नतीजा माना जा रहा है. पिछले एक दशक में ABVP ने JNU में अपनी जड़ें मजबूत की हैं. हर साल वह 800 से 1,000 वोट हासिल करती रही है.

इस बार के चुनाव में भी ABVP चारों प्रमुख पदों पर दूसरे स्थान पर रही. वहीं, वामपंथी संगठनों, जैसे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI), को इस बार आंतरिक मतभेदों का सामना करना पड़ा. पहले जहां ये संगठन एकजुट होकर चुनाव लड़ते थे, इस बार AISA और SFI ने अलग-अलग उम्मीदवार उतारे. इस विभाजन ने उनकी ताकत को कमजोर किया.

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