नई दिल्ली: इन दिनों सपा प्रमुख अखिलेश यादव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी के साथ वायरल हो रहा है, जिसमें वह एक इफ्तार पार्टी के दौरान शामिल होते हैं. अखिलेश यादव इस वीडियो में दुआ मांगते समय अचानक से हाथ जोर लेते हैं. सोशल मीडिया पर इस वीडियो को सैकड़ों लोगों ने लाइक और शेयर किया है और प्रतिक्रियाएं भी दे रहे हैं. मौका था सपा राष्ट्रीय प्रवक्ता हैदर अब्बास के द्वारा एक निजी होटल में आयोजित इफ्तार पार्टी का.
Wait till end, ये वीडियो देखकर मजा आ जाएगा आपको!#fun #funny #viralvideo #hindu #akhilesh #EidUlFitr pic.twitter.com/m3IYPAtmEJ
— India First - Unfiltered Voice (@indiafirst_uv) April 1, 2025
रोजा खोलने से पहले समारोह में शामिल लोग दोनों हाथ खोलकर दुआ मांगते हैं. इस दौरान अखिलेश यादव भी वही करते हैं. लेकिन दुआ खत्म होते ही अखिलेश जो करते हैं, उसपर सोशल मीडिया में चर्चाएं शुरू हो जाती है. सपा समर्थक इस वीडियो को शेयर करते हैं और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसला पेश करते हैं. वहीं, राइट विंग लोग अखिलेश यादव पर निशाना साधते हैं, तो कुछ लोग अखिलेश यादव का मजाक उड़ाते हैं.
बताते चलें कि इफ्तार पार्टी और राजनीति का संबंध भारत में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है. इफ्तार, रमजान के महीने में मुसलमानों द्वारा सूर्यास्त के समय रोजा खोलने का धार्मिक कार्य है, लेकिन भारत में यह कई बार राजनीतिक मंच के रूप में भी सामने आया है. उसी का उदाहरण है अखिलेश यादव और अन्य नेताओं का इफ्तार पार्टी में शामिल होना.
ऐतिहासिक रूप से, देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के बाद इफ्तार पार्टियों की शुरुआत की थी. इसका मकसद विभिन्न समुदायों के बीच आपसी सौहार्द को बढ़ाना और मुस्लिम समुदाय को विभाजन के बाद एकजुटता का संदेश देना था. समय के साथ यह परंपरा राजनीतिक नेताओं के लिए एक अवसर बन गई, जहां वे अपनी सहिष्णुता और समावेशिता का प्रदर्शन करते थे.
कई प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों और मुख्यमंत्रियों ने अपने कार्यकाल में इफ्तार पार्टियों का आयोजन किया. उदाहरण के लिए, अटल बिहारी वाजपेई ने प्रधानमंत्री रहते हुए दो बार इफ्तार की मेजबानी की, जबकि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, मायावती और अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने भी इसे जारी रखा. हालांकि, यह हमेशा से विवादों से परे नहीं रहा.
कुछ लोग इसे वोट बैंक की राजनीति या तुष्टिकरण का हिस्सा मानते हैं. खासकर हाल के वर्षों में, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उदय के साथ कई नेताओं ने इससे दूरी बनाई है. उदाहरण के तौर पर, योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में इफ्तार की परंपरा को तोड़ा और इसके बजाय कन्या पूजन जैसे आयोजन शुरू किए. इसी तरह, नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में इफ्तार पार्टियों से दूरी बनाए रखी. दूसरी ओर, विपक्षी दल जैसे कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल इसे एक सांस्कृतिक और सामाजिक मंच के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं.
यह भी देखा गया है कि इफ्तार पार्टियां राजनीतिक गठबंधनों और संदेशों को मजबूत करने का जरिया बनती हैं. मिसाल के तौर पर, बिहार में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं की इफ्तार में भागीदारी अक्सर उनके गठबंधन की मजबूती को दर्शाती है. हालांकि, कुछ मुस्लिम संगठनों ने इसे ढोंग करार देते हुए बहिष्कार भी किया है, खासकर जब उन्हें लगता है कि यह सिर्फ दिखावा है और जमीनी मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा.
कुल मिलाकर, इफ्तार पार्टियां भारत में धर्म, संस्कृति और राजनीति के जटिल मेल का प्रतीक हैं. यह एक ओर सामुदायिक एकता को दर्शाती हैं, तो दूसरी ओर राजनीतिक रणनीति और ध्रुवीकरण का हिस्सा भी बनती हैं. इसका महत्व और स्वरूप समय और नेताओं की विचारधारा के साथ बदलता रहा है. हाल के दिनों में जहां विपक्ष इफ्तार पार्टी में शामिल होकर एकजुटता दिखाने की कोशिश की है. वहीं, भाजपा जैसे दलों के नेता इसे तुष्टिकरण की राजनीति मानकर दूरी बनाए रखे हैं.