लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेंटेनेंस मामले में सख्त टिप्पणी की है. कोर्ट का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति शादी के बाद अपनी पत्नी और बच्चों का खर्च नहीं उठा पाने की स्थिति में है, तो उसे शादी करने से पहले ही सोचना चाहिए. एक बार शादी हो जाने के बाद आर्थिक तंगी का बहाना देकर भरण-पोषण की जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता.
हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि शादी करने के बाद पति पर कानूनी रूप से पत्नी का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी आ जाती है. खराब आर्थिक हालत का हवाला देकर इस दायित्व से इनकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट की टिप्पणी थी कि अगर किसी को डर है कि वैवाहिक जीवन में समस्या आने पर वह परिवार का खर्च नहीं चला पाएगा, तो उसे विवाह ही नहीं करना चाहिए.
यह टिप्पणी जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की डिविजन बेंच ने दी, जब उन्होंने पति तेज बहादुर मौर्य की अपील खारिज कर दी. प्रयागराज की फैमिली कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 24 के तहत पत्नी को 4,000 रुपए प्रति माह मेंटेनेंस देने का आदेश दिया था. पति तेज बहादुर मौर्य ने इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की.
पति का तर्क था कि उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर है, वह मजदूर है और पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ रह रही है तथा दोनों में आपसी सहमति से अलगाव हो चुका है. पत्नी ने कोर्ट में कहा कि वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, उससे धोखे से हलफनामा लिया गया और वह बच्चों का पालन-पोषण अकेले कर रही है. उसके पास कोई स्वतंत्र आय नहीं है.
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया और पति की अपील खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि 4000 रुपए की राशि आज के समय में न तो ज्यादा है और न ही पति की क्षमता से बाहर. पति ने अपनी आय के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं दिए. पत्नी बच्चों के लिए अलग से मेंटेनेंस मांग सकती है, लेकिन धारा 24 के तहत अभी केवल पति-पत्नी के बीच मेंटेनेंस का दावा हो सकता है.
पति को बकाया राशि पांच किस्तों में चुकानी होगी. कोर्ट ने पति के वकील की इस दलील को खारिज कर दिया कि वह सिर्फ मजदूर है. कोर्ट का कहना था कि शादी करने के बाद कानून के मुताबिक पत्नी का गुजारा भत्ता देना पति की बाध्यता है, चाहे उसकी आय कितनी भी कम क्यों न हो.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस फैसले में साफ संदेश दिया कि शादी एक जिम्मेदारी है. शादी करने से पहले व्यक्ति को अपनी आर्थिक स्थिति का आकलन कर लेना चाहिए, क्योंकि बाद में कानूनी दायित्व से मुकरना संभव नहीं है. फैमिली कोर्ट का मूल आदेश बरकरार रखा गया.