Ayodhya Ram Mandir Scam : जिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने मर्यादा के लिए माता सीता को त्याग दिया, जिन्हें अग्निपरीक्षा देनी पड़ी, उन्हीं के घर में चोरी हुई तो RSS के सामने अग्निपरीक्षा का दौर आ गया. आखिर वो बचाए तो किसे बचाए, और फंसाए तो किसे फंसाए, क्योंकि इस पूरे खेल में तीन ऐसे बड़े चेहरे हैं, जो इस संगठन से जुड़े हैं, और जिन पर सवाल उठ रहे हैं.
पहला नाम है चंपत राय का, दूसरा नाम है अनिल मिश्रा का और तीसरा नाम है गोपाल राव का. विश्व हिंदू परिषद के दबाव में चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा तो ट्रस्ट ने ले लिया, लेकिन गोपाल राव जो ट्रस्ट में हैं ही नहीं, वो किस हैसियत से राम मंदिर में बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे थे, इसका जवाब अब तक नहीं मिला है.
जवाब इस बात का भी नहीं मिला है कि आखिर SIT ने जब 14 लोगों को आरोपी माना तो 8 पर ही एफआईआर क्यों हुई, उनकी ही गिरफ्तारी क्यों हुई. क्या इस्तीफे के बाद अगली बारी चंपत राय की है, या फिर योगी आदित्यनाथ पर किसी ने दबाव बनाया, और जांच की दिशा बदल दी गई, जैसा आरोप विपक्ष लगा रहा है तो वो दबाव बनाने वाला कौन है. दिल्ली बनाम लखनऊ की सियासी लड़ाई लंबे वक्त से चर्चा में है. इसमें कहानी नागपुर की भी घुस जाती है, तो फिर सवाल उठता है कि आखिर एक प्रोफेसर, एक सरकारी डॉक्टर नौकरी छोड़कर राम मंदिर ट्रस्ट तक कैसे पहुंच जाता है.
बिजनौर के धामपुर में जन्मे चंपत राय पहले प्रोफेसर बने. फिर इमरजेंसी के दौरान जेल गए. 18 महीने जेल में रहने के बाद इन्होंने टीचिंग करियर छोड़कर समाजसेवा से जुड़ने की ठानी. RSS से जुड़े, 1991 में अयोध्या पहुंचे, अवध क्षेत्र के क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाए गए. विश्व हिंदू परिषद में केन्द्रीय सचिव, अंतर्राष्ट्रीय महासचिव तक का पद संभाला
VHP नेता अशोक सिंघल के करीबी कहे जाते हैं, 2020 में इन्हें ट्रस्ट में जगह मिलती है.
कहा जाता है 15 सदस्यों का जो ट्रस्ट बना, उसके जनरल सेक्रेटरी सिर्फ इसलिए इन्हें बनाया गया, क्योंकि ये लंबे वक्त से आंदोलन से जुड़े थे और तेजतर्रार माने जाते हैं, लेकिन अनिल मिश्रा के साथ ऐसा नहीं है. अंबेडकरनगर के रहने वाले डॉ. अनिल मिश्रा सरकारी होम्योपैथिक डॉक्टर हुआ करते थे. होम्योपैथिक बोर्ड के चेयरमैन के साथ-साथ ये RSS के प्रांतीय पदाधिकारी भी रहे.
ट्रस्ट में इन्हें स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल किया गया, क्योंकि ये भी उससे जुड़े थे. जबकि कर्नाटक के रहने वाले गोपाल राव को कोई पद नहीं मिला था, बावजूद इसके सुपर पावरफुल माने जाते थे. जब मंदिर बना तब निर्माण सामग्री, खासकर पत्थरों की खरीदारी कहां से होनी है. कौन-सा पत्थर आना है इन सबमें इनकी भूमिका रही, और जब मंदिर बनकर तैयार हो गया तो बिना कोई पद लिए ये हर वो काम करते रहे, जो इन्हें नहीं करना चाहिए था.
इनके एक रिश्तेदार की भूमिका भी सामने आई है, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, ये भी आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हैं, इनसे पूछताछ के बाद एसआईटी ने इन्हें अयोध्या से बाहर न जाने को कहा था. फिर भी ये कर्नाटक चले गए, जिस पर सवाल उठे, तो सबसे बड़ी बात ये है कि क्या इन्हें बचाने की कोशिश हो रही थी. इस्तीफे के बाद ये सवाल शायद नैतिक तौर पर कम हो जाए, पर इतने दिनों में क्या सबूतों के साथ कोई खेल नहीं हुआ होगा. ये लोग आरोप लगने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम राम के मंदिर में किस मर्यादा के तहत पद पर अब तक बने थे.