Ayodhya Ram Mandir Scam : अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट से जुड़े कथित चढ़ावा और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। सबसे बड़ा सवाल अब सिर्फ आरोपों का नहीं, बल्कि जांच की दिशा और जिम्मेदारी का है। चर्चा इस बात की भी है कि इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका क्या होगी और आखिर जांच का दायरा कहां तक जाएगा।
विवाद तब और बढ़ गया जब उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया। विपक्ष ने शुरुआत से ही इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पूछा कि जब इस मामले में किसी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई, तब किस कानूनी आधार पर एसआईटी गठित की गई?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एसआईटी के गठन के समय कहा था कि “दूध का दूध और पानी का पानी किया जाएगा।” एक सप्ताह बाद एसआईटी की रिपोर्ट मिलने के बाद भी उन्होंने दोहराया कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
इसी बीच राजनीतिक बहस का केंद्र अब एक नए सवाल पर आ गया है। विपक्ष का दावा है कि यदि श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के कामकाज और उसकी रिपोर्टिंग का दायरा प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक जाता है, तो फिर जांच की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) क्यों निभा रहा है? संजय सिंह ने आरोप लगाया कि जब जवाबदेही प्रधानमंत्री कार्यालय की बनती है, तब केवल राज्य सरकार की जांच पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।
विपक्ष यह भी आरोप लगा रहा है कि ट्रस्ट से जुड़े प्रमुख पदाधिकारियों के केंद्र से करीबी संबंध रहे हैं। हालांकि इन दावों पर संबंधित पक्षों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं और अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
दूसरी ओर, संत समाज की प्रतिक्रियाओं ने भी इस पूरे विवाद को और गंभीर बना दिया है। कथावाचक पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कहा कि माता जानकी के अपहरण पर रावण का पूरा वंश समाप्त हो गया था। उन्होंने कहा कि यदि किसी ने भगवान श्रीराम के नाम पर आए दान में अनियमितता की है, तो उसे कानून का दंड तो मिलेगा ही, भगवान का दंड उससे भी बड़ा होगा। कई अन्य संतों ने भी इस मामले को हिंदू समाज की आस्था से जुड़ा विषय बताते हुए कठोर कार्रवाई की मांग की है।
यही वजह है कि अब निगाहें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर टिकी हुई हैं। पिछले लगभग तीन दशकों की राजनीति में योगी आदित्यनाथ ने हिंदुत्व, मंदिरों और धार्मिक आस्था के मुद्दों को हमेशा प्रमुखता से उठाया है। ऐसे में यदि उनके शासनकाल में श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट से जुड़े वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं, तो यह राजनीतिक और धार्मिक—दोनों दृष्टि से बेहद संवेदनशील मामला बन जाता है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि एसआईटी की रिपोर्ट के आधार पर आगे क्या कार्रवाई होगी? क्या दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी? क्या जांच का दायरा और बढ़ेगा? और क्या यह पूरा मामला केवल राज्य स्तर तक सीमित रहेगा या किसी अन्य एजेंसी की भूमिका भी तय होगी? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति के साथ-साथ करोड़ों रामभक्तों की भावनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे।