Bharat Tiwari Encounter Case : भरत तिवारी के भाई, जो कई मीडिया चैनल्स से बातचीत में दावा कर रहे हैं कि एसपी राज ने उन्हें धमकी दी है. एसपी साहब जब उनके घर परिवारवालों से मिलने पहुंचे तो कैमरे के सामने सबकुछ सामान्य था, यहां तक कि पत्रकारों ने एसपी साहब से सवाल पूछने की कोशिश भी की. वो तेज कदमों से भागने लगे. आखिर जवाब देते भी तो क्या, उनकी पुलिस ने जो किया है, उसे जस्टिफाई कैसे करते, इसीलिए एसपी साहब बिना बोले निकल लिए, लेकिन इसी बीच उन्होंने कुछ ऐसा कर दिया कि पूरा परिवार सदमें में आ गया.
भरत के भाई कहते हैं कि एसपी साहब ने मुझे साइड में ले जाकर ये कहा कि सारा मजमा हटाओ, नहीं तो भरत तिवारी वाला ही हाल होगा. इस पूरे मामले को लकी बिष्ट ने भी अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर उठाया, यानि एक तो चोरी और ऊपर से सीनाजोरी वाला मामला हो गया, जिसके घर का बेटा गया है, उसके घर लोग सांत्वना देने पहुंच रहे हैं, उसे भगत सिंह बता रहे हैं, तो एसपी साहब को तकलीफ हो रही है, जबकि असल तकलीफ भरत के परिवार को ये होनी चाहिए कि आखिर एसपी साहब को हटाया क्यों नहीं गया.
इनके पद पर रहते निष्पक्ष जांच कैसे हो पाएगी. न्यायिक आयोग जो जांच कर रहा है. क्या वो पुलिसकर्मियों को बस सस्पेंड कर दिए जाने से सही दिशा में पहुंच जाएगी. आखिर एसपी साहब पर कोई गाज गिरी क्यों नहीं, इसकी दो वजह हो सकती है. पहला- ये मौके पर मौजूद नहीं थे, इनके निर्देश में पूरा मामला नहीं हुआ, बल्कि कहीं और के आदेश का इन्होंने पालन किया या फिर इन्हें सही रिपोर्ट नहीं दी गई, क्योंकि सीएम सम्राट चौधरी ने भी ये बयान दिया था कि भरत को मानसिक अस्पताल में भर्ती करवाया जा रहा है.
घटनास्थल से मानसिक अस्पताल के बीच कहानी किसने रची, भरत के भाई कहते हैं एसपी साहब के फोन की जांच होनी चाहिए, उसमें कई सबूत होंगे, तो क्या कोई ऐसी जांच होगी, या फिर परिवार की मांग सिर्फ मांग रह जाएगी. जिन साहब पर सवाल उठ रहे हैं उनका बैकग्राउंड बताता है उन्हें पहली बार कोई जिला पूरी तरह से मिला है.
एसपी साल 2019 बैच के अधिकारी हैं. UPSC की परीक्षा पास कर ये IPS बने. बिहार कैडर मिला, बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग की पढ़ाई इन्होंने की हुई है.12 सितंबर 2024 को इन्हें भोजपुर जिले का एसपी बनाया गया है. उससे पहले भागलपुर में सिटी एसपी के तौर पर ये सेवाएं दे चुके हैं.
इंजीनियरिंग वाला दिमाग लगाते तो पहले ही दिन बचाव की बजाय पुलिसकर्मियों पर सख्त एक्शन लेते. खुद की कुर्सी बचाने के बारे में सोचने की बजाय एक मिसाल पेश करते हैं. जनता में कानून व्यवस्था का विश्वास कायम करने के लिए लोगों की बातें सुनते, और अब जाकर इस तरीके की बातें नहीं करते, क्योंकि पीड़ित परिवार से इस तरीके की बातें करना भी अपराध की श्रेणी में आ सकता है.
चूंकि ये मसला अनसलुझी पहेली की तरह हो गया है. सोशल मीडिया पर तरह-तरह के दावे किए जाने लगे हैं. यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय से लेकर तमाम नेता भी वहां पहुंचने लगे हैं. इसलिए सियासत भी शुरू हो चुकी है, पर इन सबसे हटकर देखें तो बात पीड़ित परिवार की मांगों को पूरा करने की है.