राजस्थान की 13 साल की बेटी ने बदली सदियों पुरानी परंपरा, पहली बार 'पाग का दस्तूर' में बनी राजघराने की उत्तराधिकारी

Amanat Ansari 28 Jun 2026 07:41: PM 1 Mins
राजस्थान की 13 साल की बेटी ने बदली सदियों पुरानी परंपरा, पहली बार 'पाग का दस्तूर' में बनी राजघराने की उत्तराधिकारी

जयपुर: राजस्थान के पाली जिले में सदियों पुरानी राजपूत परंपरा को बदलते हुए इतिहास रच दिया गया. 13 वर्षीय तेजस्वी कुमारी जोधा को पहली बार पारंपरिक 'पाग का दस्तूर' समारोह के तहत पूर्व राजघराने का उत्तराधिकारी घोषित किया गया. अब तक यह सम्मान केवल पुरुष उत्तराधिकारियों को ही दिया जाता था, लेकिन इस ऐतिहासिक फैसले ने परंपरा में बदलाव की नई मिसाल पेश की है.

यह ऐतिहासिक समारोह पाली जिले के खेरवा किले में आयोजित किया गया, जहां बड़ी संख्या में ग्रामीणों, राजपूत समाज के लोगों और पूर्व रियासतों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी रही. तेजस्वी को उनके पिता हरीश चंद्र जोधा के निधन के बाद खेरवागढ़ राजघराने का उत्तराधिकारी घोषित किया गया. हरीश चंद्र जोधा क्षेत्र के सम्मानित जनप्रतिनिधि भी रहे थे.

'पाग का दस्तूर' राजपूत समाज की एक प्राचीन परंपरा है, जिसमें परिवार के मुखिया के निधन के बाद उत्तराधिकारी को पगड़ी पहनाकर परिवार की जिम्मेदारियां और विरासत सौंपी जाती है. वर्षों से यह रस्म केवल पुरुषों के लिए होती थी, लेकिन इस बार पहली बार किसी बेटी को यह सम्मान दिया गया. समारोह के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार के बीच तेजस्वी के सिर पर गुलाबी पगड़ी बांधी गई, जो शोक की अवधि समाप्त होने और नई जिम्मेदारी संभालने का प्रतीक मानी जाती है.

परंपरा के अनुसार पगड़ी पूर्व जोधपुर-मारवाड़ राजघराने की ओर से भेजी गई थी. इसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत राजतिलक की रस्म भी निभाई गई. यह पूरा आयोजन सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना गया और इसे महिलाओं की भागीदारी की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया.

बताया जाता है कि खेरवागढ़ राजघराने में पिछले करीब 65 वर्षों से 'पाग का दस्तूर' नहीं हुआ था, क्योंकि परिवार में कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं था. ऐसे में समाज के बुजुर्गों और परिवार ने हरीश चंद्र जोधा की इकलौती बेटी तेजस्वी को उत्तराधिकारी घोषित करने का फैसला लिया. इस निर्णय को परंपरा और आधुनिक सोच के संतुलन का प्रतीक माना जा रहा है.

तेजस्वी फिलहाल सातवीं कक्षा की छात्रा हैं. उनकी ताजपोशी के बाद यह संदेश भी गया कि बदलते समय के साथ परंपराएं भी समानता और महिलाओं के सम्मान की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं. यही वजह है कि यह समारोह अब पूरे राजस्थान ही नहीं, बल्कि देशभर में चर्चा का विषय बन गया है.

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