पटना : बिहार में शिक्षकों के फर्जी प्रमाण पत्र का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है. निगरानी जांच में बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षकों के प्रमाण पत्र संदिग्ध या फर्जी पाए गए हैं, जिन्होंने इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर सरकारी स्कूलों में नौकरी हासिल की. जुलाई तक सामने आए आधिकारिक जांच आंकड़ों के मुताबिक 3,035 शिक्षकों के प्रमाण पत्र फर्जी पाए जा चुके थे और 1,830 एफआईआर दर्ज की गई थीं.
बिहार में नियोजित शिक्षकों की नियुक्तियों, खासकर 2006 से 2015 के बीच हुई नियुक्तियों में प्रमाण पत्रों की जांच लंबे समय से चल रही है. पटना हाईकोर्ट के निर्देश के बाद निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने शैक्षणिक और प्रशिक्षण प्रमाण पत्रों का सत्यापन शुरू किया था. फरवरी तक करीब 6.67 लाख शिक्षकों के प्रमाण पत्रों का सत्यापन कराया जा चुका था.
जांच के दौरान अलग-अलग राज्यों के बोर्ड, विश्वविद्यालयों और संस्थानों से प्रमाण पत्रों का सत्यापन कराया गया. कई मामलों में दस्तावेज फर्जी या रिकॉर्ड से मेल नहीं खाने वाले पाए गए. मामले में बिहार के बाहर से जारी प्रमाण पत्रों की भी जांच की जा रही है. यूपी समेत दूसरे राज्यों के संस्थानों से जारी डिग्री और प्रशिक्षण प्रमाण पत्रों के सत्यापन में भी गड़बड़ियां सामने आई हैं.
अलग-अलग राज्यों से जुड़े संदिग्ध प्रमाण पत्रों की संख्या को लेकर उपलब्ध रिपोर्टों में आंकड़े अलग-अलग हैं, इसलिए अंतिम संख्या जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी. जिन शिक्षकों की नियुक्ति फर्जी दस्तावेज के आधार पर साबित होगी, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान है.
पटना हाईकोर्ट ने भी ऐसे मामलों में नौकरी समाप्त करने के साथ वेतन की वसूली और अभियोजन की कार्रवाई का रास्ता स्पष्ट किया है. सरकार की कार्रवाई का असर उन शिक्षकों पर पड़ सकता है जिनके दस्तावेज अभी सत्यापन के दायरे में हैं. जांच पूरी होने के बाद ही यह साफ होगा कि संदिग्ध प्रमाण पत्रों में कितने वास्तव में फर्जी पाए जाते हैं और कितने शिक्षक कार्रवाई की जद में आते हैं.