मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कहा है कि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए किसी नागरिक को उसके शहर से बाहर नहीं किया जा सकता. अदालत ने मुंबई पुलिस द्वारा जारी किए गए एक्सटर्नमेंट (निर्वासन) के आदेश को रद्द कर दिया. न्यायमूर्ति माधव जामदार की एकल पीठ ने SDPI (सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी (49 वर्ष) की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की.
क्या था मामला?
चौधरी पर केंद्र सरकार के विभिन्न फैसलों (जैसे नागरिकता संशोधन कानून, NRC, ईंधन मूल्य वृद्धि आदि) के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए 5 FIR दर्ज हुई थीं. इन प्रदर्शनों के आधार पर मुंबई पुलिस के डिप्टी कमिश्नर ने दिसंबर 2025 में उन्हें मुंबई और आसपास के इलाकों से एक साल के लिए बाहर करने का आदेश दिया था.
इस आदेश को कोनकण डिविजनल कमिश्नर ने भी बरकरार रखा था. अदालत ने पुलिस की इस कार्रवाई को मालाफाइड (दुरुपयोग) बताते हुए कहा कि प्रदर्शन करना और सरकार के खिलाफ नारे लगाना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है. न्यायमूर्ति जामदार ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, ''नागरिक सरकार के फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन और आंदोलन करने के हकदार हैं. केवल प्रदर्शन करने या नारे लगाने के लिए पुलिस उन्हें अपने ही शहर से बाहर नहीं निकाल सकती.''
अदालत ने आगे कहा कि पुलिस अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं, न कि मंत्रियों के कार्यकर्ता. बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस एक्ट के तहत जारी एक्सटर्नमेंट आदेश को रद्द कर दिया.
कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन आयोजित करने और भाग लेने को “पब्लिक ऑर्डर के लिए खतरा” मानकर किसी को दंडित करना अनुच्छेद 19 और 21 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है. यह फैसला लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को मजबूती देता है और पुलिस की मनमानी पर लगाम लगाने वाला माना जा रहा है.