आपके पापा, चाचा या कोई भी रिश्तेदार चुनावी ड्यूटी में लगा है तो ये रिपोर्ट ध्यान से पढिए. ये रिपोर्ट उनकी सुरक्षा से जुड़ा है. ये मामला इतना बड़ा है कि मैनपुरी में चुनाव के दौरान गाड़ी पर जो पत्थर चले और बदायूं में नाले में जो सपा की पर्ची मिली, उसे भी आप भूल जाएंगे. पूरी कहानी मध्य प्रदेश के बैतुल लोकसभा सीट की है.
7 मई को चुनाव खत्म करवाकर एक गाड़ी से सभी चुनावी कर्मचारी और सुरक्षाकर्मी लौट रहे थे. चारों तरफ से सुरक्षाकर्मियों के घेरे के बीच पीठासीन अधिकारी बैठे थे. उनके साथ बाकी के चुनावी कर्मचारी मौजूद थे और ईवीएम गाड़ी में रखी हुई थी. तभी बस से धुआं उठने लगता है. सुरक्षाकर्मी कूदकर जान बचाते हैं.
सब अचानक से नीचे छलांग लगाते हैं, जिसे जहां से मौका मिलता है गाड़ी से बाहर उतरने की कोशिश करता है और जितनी ईवीएम उतर पाती है उसे उतारता है और बाकी की ईवीएम गाड़ी में ही खाक हो जाती है. बाद में पता चलता है कि गाड़ी में हुई किसी खराबी की वजह से ये सबकुछ हुआ है.
गाड़ी में 6 पोलिंग बूथ के ईवीएम-वीवीपैट थे.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिकगाड़ी में 6 पोलिंग बूथ के ईवीएम और वीवीपैट रखे हुए थे. बैतूल की मुलताई विधानसभा के मतदान केंद्र क्रमांक 275 रजापुर, 276 डूंडर, 277 गेहूंबारसा 1, 278 गेहूंबारसा 2, 279 कुंदारैयत और 280 चिखली माल मतदान केंद्र के मतदान कर्मी सवार थे. पीठासीन अधिकारी मुन्नलाल ने बताया कि पोलिंग टीम की कुछ मशीनें खाक हो गई. वीवीपैट, मतपत्र और कई सील वगैरह गाड़ी में ही रह गए.
दोबारा चुनाव कराने की उठ रही मांग
इसी वजह से इन जगहों पर दोबारा चुनाव की मांग उठने लगी है. एक ईवीएम की कीमत अगर देखें तो एक ईवीएम की कीमत करीब 17 हजार रुपये है. अब कितने ईवीएम खराब हुए हैं इसकी सटीक जानकारी अब तक सामने नहीं आई है, लेकिन बैठे-बिठाए चुनाव आयोग को लाखों का नुकसान जरूर हो गया है. इस बात की जांच होनी चाहिए कि ये सिर्फ एक हादसा था या किसी ने कोई बड़ी साजिश रची थी और गनीमत रही कि मामला आगे नहीं बढ़ा.
चुनाव के लिए इतनी गाड़ियां आती कहां से...
हालांकि आपके लिए ये जानना भी ज्यादा जरूरी है चुनाव के लिए इतनी गाड़ियां आती कहां से है. अगर चुनाव आयोग ने आपकी पर्सनल गाड़ी चुनाव करवाने के लिए मांगी तो आप उसे मना कर सकते हैं कि नहीं. रिप्रजंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट की धारा 160 में साफ कहा गया है कि इलेक्शन कमीशन चुनाव के लिए किसी भी जगह और प्राइवेट वाहन की मांग कर सकता है. मतपेटियों को लाने ले जाने, पुलिस की सवारी या किसी अन्य ड्यूटी में इस्तेमाल के लिए वाहन, जहाज या जानवर को लिखित आदेश देकर अपने कब्जे में ले सकता है. इसके लिए एक महीने के अंदर सरकार को ई-पेमेंट के जरिए किराया भुगतान करना होगा.
अगर आपकी गाड़ी पर सरकार की नजर होगी तो आपको एक लेटर मिलेगा, जिसमें तय समय और तारीख लिखी होगी और कहा जाएगा कि पेट्रोल-डीजल इसे इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति भरवाएगा. लेकिन सवाल ये है कि अगर आपने मना कर दिया तो क्या होगा, नियम ये कहता है कि अगर आपने मना किया तो एक साल की सजा हो सकती है. लेकिन अगर आपके पास कोई सही वजह है, जिसकी वजह से आप गाड़ी देने से इनकार कर रहे हैं और अधिकारी मान जाते हैं तो फिर आप सजा से बच सकते हैं.
लोकल पुलिस की ये जिम्मेदारी होती है कि जिन गाड़ियों को चुनाव में इस्तेमाल किया जाना है, उन्हें तय समय पर तय जगह पर पहुंचाया जाए और गाड़ी दुरुस्त होनी चाहिए, अब मध्य प्रदेश वाले केस में किस पर कार्रवाई होती है ये देखने वाली बात होगी.