Z+ Category Security for the Chick: कच्छ के अबडासा इलाके में एक दुर्लभ घटना ने वन विभाग की पूरी व्यवस्था को हिला दिया है. 26 मार्च को ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) का एक चूजा अंडे से बाहर निकला. इस नवजात चूजे की सुरक्षा के लिए विभाग ने ऐसी सख्त व्यवस्था कर दी है, जैसी आमतौर पर बड़े नेताओं और वीवीआईपी को ही दी जाती है.
चूजे को Z+ श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराई गई है. उसके घोंसले के आसपास 50 से ज्यादा कर्मचारी लगातार तैनात हैं. इलाके में वॉच टावर बनाए गए हैं, जिनसे 24 घंटे निगरानी की जा रही है. स्पॉटिंग स्कोप और दूरबीनों के जरिए हर पल इस चूजे पर नजर रखी जा रही है. घोंसले की ओर जाने वाले रास्ते पूरी तरह बंद कर दिए गए हैं. चूजे की हर गतिविधि की रिपोर्ट सीधे गांधीनगर के उच्च अधिकारियों को भेजी जा रही है.
वन विभाग ने इस अभियान को बेहद गंभीरता से लिया है. सहायक वन संरक्षक और उप वन संरक्षक समेत अनुभवी फील्ड स्टाफ मौके पर डेरा डाले हुए हैं. पुराने कर्मचारियों को भी विशेष रूप से बुलाया गया है, जो इलाके की भूगोल और परिस्थितियों से अच्छी तरह परिचित हैं. तीन अलग-अलग शिफ्टों में स्टाफ काम कर रहा है ताकि निगरानी कभी रुक न सके.
चूजे को किसी भी खतरे से बचाने के लिए कई सावधानियां बरती जा रही हैं. घोंसले के आसपास आवारा कुत्तों और मवेशियों को भगाया जा रहा है. गांव की कुछ सड़कें चुपचाप बंद कर दी गई हैं. टूटी बाड़ों की मरम्मत की जा रही है. आसपास के गांववालों को मवेशी चराने से रोका जा रहा है. इलाके के जलस्रोतों को भी जानबूझकर सूखा रखा गया है, ताकि कोई शिकारी जानवर चूजे के पास न पहुंच सके.
मादा गोडावण (चूजे की मां) लगभग 3 वर्ग किलोमीटर के घास के मैदान में घूम रही है. उसकी हर हरकत पर भी सतर्क नजर रखी जा रही है. पिछले साल अक्टूबर में उसके शरीर पर एक ट्रैकिंग टैग लगाया गया था, जिससे उसकी लोकेशन और गतिविधियों का रीयल-टाइम डेटा मिलता रहता है. अगर मादा पक्षी अचानक तेज या बेतरतीब तरीके से घूमने लगे तो तुरंत खतरे का संकेत माना जाता है और स्टाफ कुछ ही मिनटों में मौके पर पहुंच जाता है.
वन विभाग के प्रधान मुख्य संरक्षक (वाइल्डलाइफ) जयपाल सिंह ने बताया कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड दुनिया की सबसे संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों में से एक है. गुजरात में पिछले दस साल में यह पहला चूजा है जो जंगलों में सफलतापूर्वक पैदा हुआ है. चूजे को अंडे से निकालना और फिर उसे कम से कम एक महीने तक जिंदा रखना बड़ी चुनौती है. इसलिए जैसलमेर और कच्छ के भारतीय वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञ इस पूरे ऑपरेशन की निगरानी कर रहे हैं.
विभाग के कर्मचारी इस चूजे की देखभाल को अपने घर के बच्चे की तरह कर रहे हैं. हर स्टाफ सदस्य पूरी तत्परता से लगा हुआ है. वन संरक्षक धीरज मित्तल ने भी इस अभियान को पूरी तरह से टीम वर्क बताया. यह अभियान न सिर्फ एक दुर्लभ पक्षी प्रजाति को बचाने का प्रयास है, बल्कि वन विभाग की प्रतिबद्धता को भी दिखाता है कि वे संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा के लिए कितनी मेहनत और संसाधन लगा सकते हैं.