नई दिल्ली/वाराणसी: उत्तर प्रदेश के तीन बड़े मंदिर-मस्जिद विवादों में एक बार फिर कानूनी लड़ाई तेज हो गई है. हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट के मीडिएशन (आपसी बातचीत) के प्रस्ताव को साफ तौर पर ठुकरा दिया है. अब इन मुद्दों का फैसला पूरी तरह अदालती प्रक्रिया के जरिए ही होगा. सुप्रीम कोर्ट प्रशासन की विशेष पहल "समाधान समारोह 2026" के तहत अप्रैल में इन विवादों के सभी पक्षों को मीडिएशन के लिए आमंत्रित किया गया था.
इसका मकसद था कि ज्ञानवापी (वाराणसी), श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह (मथुरा) और संभल की शाही जामा मस्जिद विवाद को आपसी सहमति से सुलझाया जाए. लेकिन दोनों पक्षों ने एकमत से यह रास्ता अस्वीकार कर दिया.
दोनों पक्षों का एक ही रुख
मंदिर पक्ष के वकीलों का कहना है कि इन मामलों में पूजा स्थल का स्वरूप, मालिकाना हक, संवैधानिक अधिकार और गहरे ऐतिहासिक-पुरातात्विक सवाल जुड़े हैं. ऐसे जटिल मुद्दों को लोक अदालत या मीडिएशन के जरिए नहीं सुलझाया जा सकता. मस्जिद प्रबंधन समितियों ने भी कहा कि वे शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं, लेकिन कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे. दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट को लिखित रूप में बता दिया कि वे मीडिएशन प्रक्रिया में शामिल नहीं होंगे.
विवाद क्या हैं?
ज्ञानवापी को लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि मस्जिद के नीचे प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर था, जिसे औरंगजेब ने तोड़ा. ASI रिपोर्ट में भी मंदिर जैसी संरचना के सबूत मिले हैं. वहीं, शाही ईदगाह मस्जिद को मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि बताया जाता है. संभल शाही जामा मस्जिद को लेकर हालिया दावा कि यह मंदिर तोड़कर बनाई गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने पहले इन मामलों में मौजूदा व्यवस्था (मस्जिद में नमाज और व्यास तहखाने में पूजा) बनाए रखने का आदेश दिया था, लेकिन अब पूर्ण सुनवाई जारी है.
अब क्या होगा?
चूंकि मीडिएशन की सहमति नहीं बनी, इसलिए ये मामले अब पूरी तरह अदालती प्रक्रिया से गुजरेंगे. विशेष लोक अदालत (21-23 अगस्त) में भी ये विवाद शामिल नहीं होंगे. यह फैसला दिखाता है कि दोनों पक्ष कानून के शासन पर पूरा भरोसा रखते हैं और किसी भी समझौते से पहले अदालत का अंतिम फैसला चाहते हैं.