दिव्य भी, भव्य भी : एकता के महाकुंभ के साथ ही वसुधैव कुटुंबकम का संदेश

Deepa Bisht 03 Feb 2025 03:35: PM 3 Mins
दिव्य भी, भव्य भी : एकता के महाकुंभ के साथ ही वसुधैव कुटुंबकम का संदेश

महाकुंभ नगर: बसंत पंचमी पर महाकुंभ में भारत के हर राज्य और हर जाति के लोगों ने एक साथ संगम में अमृत स्नान किया. इसके साथ दुनिया भर के कई देशों के श्रद्धालु भी पहुंचे और 'जय श्रीराम', 'हर हर गंगे', 'बम बम भोले' के उद्घोष के साथ भारतीय जनमानस के साथ घुल-मिल गए. अमृत स्नान पर महाकुंभ नगर में 'एकता का महाकुंभ' नजर आया. यहां भारत की सनातन संस्कृति से अभिभूत विदेशी नागरिकों ने परिवार के साथ पहुंचकर गंगा स्नान किया.

महाकुंभ के इस ऐतिहासिक मौके पर संगम का तट भारतीय और विदेशी श्रद्धालुओं से पूरी तरह से भर गया. आस्था का ऐसा संगम हुआ कि संगम की रेत तक नजर नहीं आ रही थी. हर जगह सिर्फ मुंड ही मुंड नजर आ रहे थे. दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, केरल, आंध्र प्रदेश समेत हर राज्य, हर जाति के लोग और अन्य देशों से आए विदेशी नागरिकों ने संगम के पवित्र जल में डुबकी लगाकर पुण्य अर्जित किया. अमेरिका, इजरायल, फ्रांस समेत कई अन्य देशों के नागरिक गंगा स्नान करते हुए भारत की सनातन संस्कृति से अभिभूत हुए. वे भी 'बम बम भोले' के नारे लगाते हुए उत्साह से झूमते नजर आए. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में 'दिव्य और भव्य महाकुंभ' का अलौकिक आयोजन किया गया है. भारत की सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक शक्ति महाकुंभ के इस बार के अद्भुत आयोजन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी महत्ता और भी ज्यादा बढ़ा दी है.

महाकुंभ में दुनिया भर के कई देशों के नागरिकों ने भाग लिया और भारत की संस्कृति को अनुभव किया. विदेशी श्रद्धालु भारत की सनातन संस्कृति से गहरे प्रभावित हुए और परिवार के साथ गंगा में स्नान किया. संगम के तट पर 'जय श्री राम' और 'हर हर गंगे' के उद्घोष से माहौल बना और श्रद्धालु श्रद्धा से गंगा में डुबकी लगाते रहे. प्रयागराज का महाकुंभ विश्व का सबसे बड़ा मानवीय और आध्यात्मिक सम्मेलन है. यूनेस्को ने महाकुंभ को 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' घोषित किया है. सीएम योगी का मानना है कि महाकुंभ भारत की सांस्कृतिक विविधता में समाई हुई एकता और समता के मूल्यों का सबसे बड़ा प्रतीक है. यहां सब एक समान हैं. करोड़ों लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ त्रिवेणी संगम में डुबकी लगा रहे हैं. श्रद्धालु, समस्त साधु, संन्यासियों का आशीर्वाद ले रहे हैं, मंदिरों में दर्शन कर अन्नक्षेत्र में एक ही पंगत में बैठकर भंडारों में खाना खा रहे हैं.

महाकुंभ भारत की सांस्कृतिक विविधता में समाई हुई एकता और समता के मूल्यों का सबसे बड़ा प्रदर्शन स्थल है, जिसे दुनिया भर से आए पर्यटक देखकर आश्चर्यचकित हैं. कैसे अलग-अलग भाषायी, रहन-सहन, रीति-रिवाज को मानने वाले एकता के सूत्र में बंधे संगम में स्नान करने चले आते हैं. साधु-संन्यासियों के अखाड़े हों या तीर्थराज के मंदिर और घाट, बिना रोकटोक श्रद्धालु दर्शन, पूजन करने जा रहे हैं. संगम क्षेत्र में चल रहे अनेक अन्न भंडार सभी भक्तों, श्रद्धालुओं के लिए दिन-रात खुले हैं, जहां सभी लोग एक साथ पंगत में बैठकर भोजन ग्रहण कर रहे हैं. महाकुंभ मेले में भारत की विविधता इस तरह समरस हो जाती है कि उनमें किसी तरह का भेद कर पाना संभव नहीं है.

महाकुंभ में सनातन परंपरा को मानने वाले शैव, शाक्त, वैष्णव, उदासीन, नाथ, कबीरपंथी, रैदासी से लेकर भारशिव, अघोरी, कपालिक सभी पंथ और संप्रदायों के साधु-संत एक साथ मिलकर अपने-अपने रीति-रिवाजों से पूजन-अर्चन और गंगा स्नान कर रहे हैं. संगम तट पर लाखों की संख्या में कल्पवास करने वाले श्रद्धालु देश के कोने-कोने से आए हैं. अलग-अलग जाति, वर्ग, भाषा को बोलने वाले साथ मिलकर महाकुंभ की परंपराओं का पालन कर रहे हैं.

महाकुंभ में अमीर, गरीब, व्यापारी, अधिकारी सभी तरह के भेदभाव भुलाकर एक साथ एक भाव में संगम में डुबकी लगा रहे हैं. महाकुंभ और मां गंगा, नर, नारी, किन्नर, शहरी, ग्रामीण, गुजराती, राजस्थानी, कश्मीरी, मलयाली किसी में भेद नहीं करती. अनादि काल से सनातन संस्कृति की समता, एकता की यह परंपरा प्रयागराज में संगम तट पर महाकुंभ में अनवरत चलती आ रही है. 

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