नई दिल्ली: लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के परिसर में कुछ मजारों को अवैध निर्माण घोषित करते हुए प्रशासन ने 15 दिनों के अंदर इन्हें हटाने का अंतिम नोटिस जारी किया है. इस कदम से काफी विवाद खड़ा हो गया है, और विभिन्न धार्मिक तथा राजनीतिक संगठनों ने इसका कड़ा विरोध जताया है.
विश्वविद्यालय प्रशासन का रुख साफ है कि ये संरचनाएं विश्वविद्यालय की जमीन पर बिना अनुमति के बनी हुई हैं, जो शैक्षणिक और चिकित्सा उद्देश्यों के लिए आरक्षित है. नोटिस में चेतावनी दी गई है कि यदि समय पर इन्हें नहीं हटाया गया, तो पुलिस की मदद से जबरन ध्वस्त कर दिया जाएगा, और इससे होने वाला खर्च संबंधित पक्षों से वसूला जाएगा. प्रशासन ने नियमों और सरकारी नीतियों का हवाला देते हुए इसे पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया बताया है.
समाजवादी पार्टी ने जताया विरोध
दूसरी ओर, विरोध करने वाले समूहों, जिनमें समाजवादी पार्टी, विभिन्न मुस्लिम संगठन, उलेमा और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं, का कहना है कि ये मजारें सदियों पुरानी हैं (कुछ दावों के अनुसार लगभग 600 वर्ष पुरानी) और इनका गहरा ऐतिहासिक, धार्मिक तथा सामाजिक महत्व है. इनका तर्क है कि ये सिर्फ इमारतें नहीं, बल्कि लोगों की पीढ़ियों से जुड़ी आस्था का केंद्र रही हैं, जहां विभिन्न समुदायों के लोग दुआएं मांगने आते रहे हैं.
कई प्रमुख व्यक्तियों ने हिस्सा लिया
शाहमीना शाह क्षेत्र में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई प्रमुख व्यक्तियों ने हिस्सा लिया, जिसमें मौलाना कल्बे जवाद जैसे धर्मगुरु भी शामिल थे. उन्होंने नोटिस को जल्दबाजी और असंवेदनशील बताया, और सवाल उठाया कि इतने वर्षों तक प्रशासन चुप क्यों रहा, और अचानक कार्रवाई क्यों? उनका आरोप है कि यह कदम धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है और संवैधानिक धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है. समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधियों ने इसे सामाजिक सद्भाव पर हमला करार दिया और चेतावनी दी कि यदि मजारें हटाई गईं, तो सड़कों पर बड़े स्तर पर विरोध होगा, जो पूरे प्रदेश में फैल सकता है.
राज्य सरकार से हस्तक्षेप की मांग
कई वक्ताओं ने जोर दिया कि यह मुद्दा केवल एक समुदाय का नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और सौहार्द से जुड़ा है. यदि एक की आस्था को नजरअंदाज किया गया, तो आगे दूसरों की बारी आ सकती है. उन्होंने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है, और मजारों को बचाने के लिए मुख्यमंत्री तथा संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन सौंपने की योजना बनाई है. साथ ही, कानूनी रास्ते से भी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया गया है.
यह विवाद अब प्रशासनिक कार्रवाई से आगे बढ़कर राजनीतिक और भावनात्मक स्तर पर पहुंच चुका है. एक तरफ प्रशासन अपने फैसले पर अडिग है, तो दूसरी तरफ विरोधी पक्ष संवाद और वैकल्पिक समाधान की मांग कर रहा है. आने वाले दिनों में सरकार का रुख और संभव मध्य मार्गी हल इस मामले की दिशा तय करेगा, वरना तनाव और बढ़ने की आशंका है.