Inflation in Nepal: अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण उर्वरकों (फर्टिलाइजर) की वैश्विक कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है. ऐसे समय में भारत अपने पड़ोसी नेपाल को बाजार भाव से कम कीमत पर खाद उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है, जबकि भारत स्वयं इन्हीं उर्वरकों को लगभग दोगुनी कीमत पर आयात कर रहा है.
यह कदम उस समय उठाया जा रहा है जब नेपाल, प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व में, लिपुलेख दर्रा को लेकर भारत के खिलाफ कूटनीतिक विवाद को फिर से हवा दे रहा है. यह दर्रा ऐतिहासिक रूप से ब्रिटिश शासनकाल से भारत के नियंत्रण में रहा है, लेकिन नेपाल पिछले लगभग तीन दशकों से इस पर दावा करता आया है.
नेपाल के अखबार The Kathmandu Post की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल सरकार ने सोमवार को सिद्धांततः मंजूरी दी कि सरकारी कंपनी Agriculture Inputs Company भारत से सरकार-से-सरकार (G2G) समझौते के तहत 80,000 टन रासायनिक उर्वरक खरीदेगी.
रोपाई सीजन से पहले नेपाल में खाद की कमी
नेपाल में रोपाई के मौसम से पहले खाद की भारी कमी देखी जा रही है. सरकार ने 2,50,000 टन रासायनिक उर्वरक की आवश्यकता का अनुमान लगाया था, लेकिन उसके पास केवल 1,71,000 टन स्टॉक उपलब्ध था. निजी टेंडरों के माध्यम से 94,450 टन अतिरिक्त आपूर्ति की उम्मीद भी अधर में लटकी हुई है. नेपाल के कृषि एवं पशुपालन विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव रामकृष्ण श्रेष्ठ के अनुसार, वर्तमान वैश्विक कीमतों पर खाद को पूरी तरह सब्सिडी देना सरकार की क्षमता से बाहर है, क्योंकि इसके लिए लगभग 80 अरब नेपाली रुपये की जरूरत पड़ेगी. फिलहाल यूरिया की कीमत 160 रुपये प्रति किलोग्राम और डीएपी (DAP) की कीमत 162 रुपये प्रति किलोग्राम है.
भारत से सस्ती दर पर उर्वरक खरीदने की तैयारी
नेपाल की सरकारी कंपनी ने भारत की सरकारी कंपनी Rashtriya Chemicals and Fertilisers Limited से 60,000 टन यूरिया और 20,000 टन डीएपी खरीदने के लिए G2G समझौता करने की पहल की है. यह खरीद 2022 में भारत और नेपाल के बीच हुए एक समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत की जा रही है, जिसमें भारत ने नेपाल की वार्षिक खाद आवश्यकता का कम-से-कम 30% उपलब्ध कराने की गारंटी दी थी.
यह मात्रा पहले वर्ष में 1,50,000 टन से शुरू होकर पांचवें वर्ष तक 2,10,000 टन तक बढ़नी थी. अगर यह सौदा पूरा हो जाता है, तो भारत नेपाल को वैश्विक बाजार कीमतों से काफी कम दाम पर खाद देगा, जबकि भारत स्वयं बढ़ती कीमतों का भारी बोझ उठा रहा है.
भारत का खुद का आयात बिल बढ़ा
समाचार एजेंसी Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने हाल ही में 25 लाख मीट्रिक टन यूरिया आयात करने का रिकॉर्ड समझौता किया. यह कीमत दो महीने पहले की तुलना में लगभग दोगुनी बताई गई है. ईरान युद्ध शुरू होने से पहले भारत पश्चिमी तट के लिए 508 डॉलर प्रति टन और पूर्वी तट के लिए 512 डॉलर प्रति टन की दर से यूरिया खरीद रहा था. अब यह कीमत बढ़कर क्रमशः 935 डॉलर और 959 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है.
खाद सहायता के बीच नेपाल का लिपुलेख विवाद
एक ओर भारत नेपाल को सस्ती खाद उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर काठमांडू में सरकार ने Lipulekh Pass पर अपना दावा फिर से तेज कर दिया है. यह दर्रा भारत के उत्तराखंड राज्य और चीन के तिब्बत क्षेत्र के बीच स्थित है तथा Kailash Mansarovar यात्रा का प्रमुख मार्ग है.
नेपाल 1996 से कालापानी क्षेत्र के दक्षिणी हिस्से, जिसमें लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी शामिल हैं, पर दावा करता रहा है. हालांकि यह क्षेत्र ब्रिटिश काल से भारतीय प्रशासन के अधीन रहा है. हाल ही में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारत द्वारा Kailash Mansarovar Yatra फिर शुरू करने पर विरोध दर्ज कराया. यह यात्रा 2020 में कोविड-19 महामारी के कारण बंद कर दी गई थी.
पिछले सप्ताह भारत और चीन के बीच समझौते के बाद यात्रा दोबारा शुरू करने की घोषणा हुई. नेपाल ने भारत और चीन दोनों को भेजे गए अपने विरोध पत्र में कहा कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल का हिस्सा हैं और इस मुद्दे पर उसकी स्थिति “स्पष्ट और दृढ़” है.
इसके जवाब में भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा, ''लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है और इस मार्ग से यात्रा दशकों से होती आ रही है. यह कोई नया विकास नहीं है.'' भारत ने यह भी कहा कि नेपाल के क्षेत्रीय दावे ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित नहीं हैं तथा एकतरफा तरीके से सीमा दावों का विस्तार स्वीकार्य नहीं है.
साथ ही भारत ने संवाद और कूटनीति के माध्यम से सभी लंबित सीमा मुद्दों के समाधान की इच्छा भी जताई. पूरे घटनाक्रम में विडंबना साफ दिखाई देती है. भारत, खुद बढ़ी हुई कीमतों पर खाद खरीदते हुए भी नेपाल को सस्ती दरों पर उर्वरक देने की तैयारी कर रहा है, जबकि नेपाल भारत के नियंत्रण वाले क्षेत्रों पर पुराने दावों को फिर से उभार रहा है.