नई दिल्ली: 24 नवंबर 2024 को उत्तर प्रदेश के संभल जिले में शाही जामा मस्जिद के अदालत द्वारा आदेशित सर्वे के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी थी. यह सर्वे एक याचिका पर आधारित था, जिसमें दावा किया गया था कि मस्जिद का निर्माण किसी प्राचीन हरिहर मंदिर के खंडहरों पर हुआ है. 19 नवंबर को पहला सर्वे हो चुका था, लेकिन 24 नवंबर को दूसरे चरण के दौरान सुबह करीब 7 बजे टीम पहुंची. खबर फैलते ही बड़ी संख्या में स्थानीय लोग जमा हो गए.
स्थिति बिगड़ने लगी, भीड़ ने सर्वे टीम और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया. कुछ रिपोर्टों में आसपास के घरों से भी पत्थर फेंके जाने की बात आई. पुलिस ने स्थिति नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया, जिसमें लाठीचार्ज और फायरिंग शामिल थी. इस हिंसा में चार से पांच लोगों की मौत हुई (ज्यादातर गोली लगने से), और करीब 29 पुलिसकर्मी घायल हुए.
कई युवक इसमें शामिल थे, जिनमें कुछ निर्दोष बताए गए. दावा किया गया कि खग्गू सराय इलाके के निवासी यामीन के बेटे आलम (उम्र लगभग 23-24 वर्ष) उस दिन ठेले पर बिस्कुट-टोस्ट/पापड़ बेचने निकले थे. हिंसा वाले इलाके में पहुंचने पर उन पर गोली लग गई. परिजनों के अनुसार, पीठ में दो और हाथ में एक गोली लगी. इलाज पहले स्थानीय अस्पताल में छिपकर कराया गया, फिर मेरठ के क्रिटिकल केयर सेंटर में 26 नवंबर को ऑपरेशन हुआ.
परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने आलम को ही हिंसा का आरोपी बना दिया और मुकदमा दर्ज कर दिया, जबकि वह बेकरी सामान बेचने निकले थे. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) विभांशु सुधीर ने 9 जनवरी 2026 या उसके आसपास को एक याचिका पर सुनवाई के बाद बड़ा फैसला सुनाया. यामीन आलम के पिता ने फरवरी 2025 में याचिका दायर की थी.
कोर्ट ने आदेश दिया कि तत्कालीन सर्कल ऑफिसर (CO) अनुज चौधरी, तत्कालीन कोतवाल अनुज तोमर और 15-20 अन्य अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज की जाए. कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि 7 दिनों के भीतर FIR दर्ज कर जांच शुरू करें और रिपोर्ट पेश करें. यह फैसला आलम के गोली लगने के मामले में पुलिस की कथित फायरिंग पर आधारित है.
संभल एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने कहा कि हिंसा में लगी गोलियां 32 बोर की थीं, जो पुलिस के हथियारों में इस्तेमाल नहीं होतीं. पोस्टमॉर्टम और बैलिस्टिक रिपोर्ट से इसकी पुष्टि हुई. उन्होंने बताया कि न्यायिक जांच पहले ही हो चुकी है और पुलिस कार्रवाई सही पाई गई, इसलिए फिलहाल FIR दर्ज नहीं की जाएगी. कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की जाएगी.
इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने पूर्व जज देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग गठित किया था. रिपोर्ट में दावा किया गया कि हिंसा पूर्व नियोजित साजिश थी. बाहर से असामाजिक तत्व बुलाए गए. विदेशी हथियारों का इस्तेमाल हुआ. रिपोर्ट में क्षेत्र में जनसांख्यिकी बदलाव और ऐतिहासिक दंगे होने की बात कही गई.
पुलिस की तत्परता से बड़ा नरसंहार टला. कुछ मौतें दंगाइयों की आपसी फायरिंग से बताई गईं. हालांकि पूरी रिपोर्ट ही विवादास्पद रही है, क्योंकि अलग-अलग पक्ष अलग-अलग व्याख्या करते हैं. वहीं, अब पीड़ित परिवार की याचिका पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR का आदेश, नया विवाद पैदा कर दिया है.