नई दिल्ली: यूरोप में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का सबसे खतरनाक रूप देखने को मिल रहा है। फ्रांस में इस साल पड़ रही अभूतपूर्व और भीषण गर्मी (Heatwave) ने बीते सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। स्वास्थ्य मंत्रालयों और वैश्विक मौसम वैज्ञानिकों के आंकड़ों के अनुसार, महज 16 दिनों के भीतर 20,000 से अधिक लोगों की जान चली गई है। पेरिस समेत देश के बड़े हिस्सों में तापमान 42 से 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच चुका है, जिसे पर्यावरणविद एक महाविनाश और बड़ी तबाही का चेतावनी संकेत मान रहे हैं।
फ्रांस के नेशनल पब्लिक हेल्थ एजेंसी (Santé Publique France) के अनुसार, इस भीषण गर्मी का सबसे भयंकर असर बुजुर्गों, दिल के मरीजों और छोटे बच्चों पर पड़ा है। राजधानी पेरिस, मार्सिले और लियोन जैसे प्रमुख शहरों के अस्पताल मरीजों से पट गए हैं।
घरों में एयर कंडीशनिंग (AC) की सीमित व्यवस्था और अचानक बढ़े तापमान के कारण हीटस्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। कई इलाकों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि शवदाह गृहों और मुर्दाघरों में जगह कम पड़ने लगी है।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तरी अफ्रीका से आ रही गर्म हवाओं और यूरोप के ऊपर बने 'हीट डोम' (Heat Dome) के कारण यह स्थिति पैदा हुई है। फ्रांस के अलावा स्पेन, इटली और पुर्तगाल में भी जंगल की आग (Wildfires) और सूखे का संकट खड़ा हो गया है।
जलवायु वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले वर्षों में यूरोप में ऐसी जानलेवा लू की घटनाएं और अधिक बार और ज्यादा घातक होंगी।
इस आपदा के बाद फ्रांस सरकार ने देश के कई प्रांतों में 'रेड अलर्ट' जारी कर दिया है। नदियों और जलाशयों का जलस्तर ऐतिहासिक रूप से घट गया है, जिससे बिजली उत्पादन और कृषि क्षेत्र को भी भारी नुकसान हुआ है। संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने इस घटना को पूरी दुनिया के लिए एक 'वेक-अप कॉल' करार दिया है।