योगी को जब जब अपनों ने चुनौती दी तब वो कैसे जीते?

Amanat Ansari 30 Jan 2026 06:30: PM 2 Mins
योगी को जब जब अपनों ने चुनौती दी तब वो कैसे जीते?

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक यात्रा में कई बार पार्टी के भीतर से ही चुनौतियां आईं, लेकिन हर बार उन्होंने अपने दृढ़ संकल्प, हिंदुत्व की मजबूत छवि और जनता के बीच लोकप्रियता से स्थिति को अपने पक्ष में कर लिया. कहा जाता है कि जब-जब अपनों ने उन्हें कठिन परीक्षा में डाला, तब-तब योगी ने काम, संगठन और शीर्ष नेतृत्व के साथ संबंधों से जीत हासिल की और आज भी मजबूती के साथ सत्ता खड़े हुए हैं.

शुरुआती दौर में पार्टी के खिलाफ कदम

2002 में गोरखपुर में बीजेपी ने शिव प्रताप शुक्ला को टिकट दिया, लेकिन योगी ने पार्टी के फैसले का विरोध किया और अपने सहयोगी राधा मोहन दास अग्रवाल को हिंदू महासभा के टिकट पर उतार दिया. नतीजा यह हुआ कि शुक्ला चुनाव हार गए और उस इलाके में योगी का नियंत्रण मजबूत हो गया. यह घटना ठाकुर-ब्राह्मण समीकरण से जुड़ी बताई जाती है, लेकिन योगी ने इसे अपनी ताकत का सबूत बनाया...

  • 2006 में लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ गोरखपुर में हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया, जहां योगी ने अपनी अलग आवाज बुलंद की. यह कदम पार्टी लाइन से अलग था, लेकिन इससे उनकी हिंदुत्ववादी छवि और मजबूत हुई.
  • 2009 में महिला आरक्षण बिल पर योगी ने पार्टी के स्टैंड से अलग रुख अपनाया और खुलकर विरोध जताया. इस दौरान उनके बयान विवादास्पद रहे, लेकिन गोरखपुर में उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि लोकसभा चुनाव में वे फिर जीते.

2012 का विधानसभा चुनाव और पार्टी की अनदेखी

2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने योगी को ज्यादा महत्व नहीं दिया. पार्टी की रणनीति में उन्हें इग्नोर किया गया, नतीजा बीजेपी तीसरे नंबर पर सिमट गई. योगी की अनदेखी का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा. अखिलेश यादव भाजपा को हराकर मुख्यमंत्री बन गए, जिससे बाद में उनकी अहमियत और बढ़ गई.

2017 के बाद मुख्यमंत्री बनने के बाद की चुनौतियां

2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद भी योगी को पार्टी के भीतर कई बार चुनौतियां मिलीं. केशव प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं के साथ विभागों को लेकर खींचतान रही, लेकिन योगी ने गृह विभाग खुद संभाला और कई महत्वपूर्ण फैसले लिए. दोनों बार, 2017 और 2022 में उन्होंने गृह मंत्रालय अपने पास रखा, जो उनकी ताकत का प्रतीक रहा. कई बार हटाने की कोशिशें हुईं, लेकिन योगी ने अपने काम से पीएम मोदी, अमित शाह और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का भरोसा जीता. उनकी 'बुलडोजर' नीति, माफिया विरोधी कार्रवाई और हिंदुत्व एजेंडा ने जनाधार को मजबूत किया.

2026 में हालिया विवाद के बाद की स्थिति

हाल ही में 2026 में भी योगी की कुर्सी को लेकर चर्चाएं हुईं. गुजरात में अमित शाह के एक बयान को योगी से जोड़ा गया, जहां उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के अनुयायियों को निराश करने वाली सरकार दोबारा सत्ता में नहीं आएगी. साथ ही शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद विवाद को भी योगी की कुर्सी से जोड़ा गया. शंकराचार्य ने योगी को चुनौती दी और 40 दिनों का अल्टीमेटम दिया, लेकिन योगी ने स्थिति संभाली. यूपी दिवस पर पीएम मोदी ने उनकी तारीफ की और अमित शाह ने पार्टी में विरोधी गुट को शांत करवाया. योगी कभी हार नहीं मानते.

कहा जाता है कि अगर उनका हाथ पूरी तरह खुल जाए तो वे तूफान ला सकते हैं, लेकिन वे सीएम की कुर्सी के साथ पार्टी के भीतर मिले जख्मों को भी देखते हैं. उनकी सफलता का राज है, अपने काम से साबित करना, हिंदुत्व पर अटल रहना और जनता के बीच मजबूत कनेक्शन बनाए रखना. यही वजह है कि अपनों की चुनौतियों के बावजूद योगी बार-बार मजबूत होकर उभरते हैं.

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