नई दिल्ली: लोकसभा सीटों के परिसीमन के मुद्दे पर राजनीतिक समीकरण ऐसे उलझे हुए हैं कि भाजपा के पास दोनों तरफ फायदा दिख रहा है, जबकि कांग्रेस के सामने कोई अच्छा विकल्प नहीं बचा है. थिंक टैंक और विश्लेषकों के अनुसार, चाहे संविधान संशोधन पास हो या न हो, सत्ताधारी दल दोनों स्थितियों में राजनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में नजर आता है.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को परिसीमन पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग करते हुए चौथी बार पत्र लिखा. इसके जवाब में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार पहले भी विपक्षी नेताओं से चर्चा कर चुकी है. लेकिन केंद्र अभी भी अपने विस्तृत प्रस्ताव सार्वजनिक रूप से सामने नहीं ला रहा है.
सरकार का सार्वजनिक रुख यह है कि 850 सीटों वाली नई लोकसभा में भी राज्यों का मौजूदा अनुपात बनाए रखा जाएगा. इससे लोकसभा का आकार करीब 50 प्रतिशत बढ़ जाएगा, लेकिन हर राज्य की हिस्सेदारी जस की तस रहेगी. इसके लिए संविधान संशोधन जरूरी है. वहीं, कांग्रेस चाहती है कि सीटों की मौजूदा संख्या 543 और राज्यों का वर्तमान बंटवारा दोनों बरकरार रहें. लेकिन मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के तहत 2027 की जनगणना के बाद सीटों का पुनर्वितरण अनिवार्य है. इसलिए कांग्रेस का यह प्रस्ताव व्यावहारिक रूप से मुश्किल लगता है.
भाजपा के पास दोनों विकल्प फायदेमंद
अगर संविधान संशोधन नहीं होता, तो मौजूदा नियमों के तहत करीब 550 सीटों का पुनर्वितरण होगा. इसमें हिंदी भाषी राज्यों को ज्यादा सीटें मिलेंगी, जिससे भाजपा को सीधा लाभ होगा. अगर संशोधन पास हो जाता है और कुल सीटें बढ़ जाती हैं, तो भी पार्टी को सोशल इंजीनियरिंग, महिला आरक्षण लागू होने पर मौजूदा पुरुष सांसदों की सीटें बचाने और विभिन्न सामाजिक वर्गों को जगह देने में आसानी होगी. दक्षिण भारत के प्रति संवेदनशीलता दिखाने से राष्ट्रीय पार्टी की छवि भी मजबूत रहेगी.
कांग्रेस के सामने दो मुश्किल रास्ते
कांग्रेस फिलहाल भाजपा के किसी भी संशोधन को रोकने की रणनीति पर चल रही है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा सीट संख्या और राज्यों की हिस्सेदारी दोनों को एक साथ बनाए रखना असंभव है. अगर सीटें बढ़ती हैं तो अनुपात बनाए रखने पर भी राज्यों के बीच सीटों का अंतर बढ़ जाएगा. अगर सीटें नहीं बढ़तीं तो नवीनतम जनगणना के आधार पर पुनर्वितरण से केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों की सीटें भारी कमी का शिकार हो सकती हैं.
दोनों ही स्थितियों में भाजपा विपक्ष को दोषी ठहराते हुए फायदा उठा सकती है. संक्षेप में, परिसीमन के इस पूरे खेल में भाजपा के दोनों हाथों में लड्डू हैं, जबकि कांग्रेस के लिए आगे कुआं और पीछे खाई जैसी स्थिति बनी हुई है. अब देखना यह है कि दोनों दल इस संवेदनशील मुद्दे पर आगे क्या रुख अपनाते हैं.