नई दिल्ली: क्या सुप्रीम कोर्ट के माननीय जज ख़ुद को सेक्युलर साबित करने के लिए एक धर्म विशेष के फैसले में ज़्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं? या फिर ख़ुद को संसद और सरकार से ऊपर साबित करने की होड़ है? ये सवाल इसलिए क्यूंकि सुप्रीम कोर्ट के हाल के कुछ फैसलों के बाद दोनों तरह के सवाल उठाये जा रहे हैं. और ये सवाल सिर्फ़ आम आदमी ही नहीं बल्कि उपराष्ट्रपति से लेकर मंत्री तक, वरिष्ठ वकीलों से लेकर बुद्धिजीवियों तक कर रहे हैं. मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना वक्फ बोर्ड की सुनवाई के दौरान कहते हैं कि जब हम सुनवाई करते हैं तो हमारा कोई धर्म नहीं होता, न्याय ही जजों का धर्म है. उन्हें ऐसा क्यों कहना पड़ा? धर्म तो राष्ट्रपति का भी नहीं होता, धर्म तो देश के प्रधानमंत्री का भी नहीं होता.
ये जरूरी सवाल
पहला सवाल कि वक्फ बोर्ड संशोधन कानून जिसे देश के चुने हुए सांसदों ने कई महीनों तक रात –दिन लगाकर तैयार किया और फिर लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों से पास कराकर राष्ट्रपति की मुहर के बाद एक कानून का रूप दिया गया उसके खिलाफ केस क्या सुप्रीम कोर्ट में सुना जाना चाहिए था? सवाल ये भी है कि जिन सांसदों ने संसद के भीतर वक्फ बोर्ड को लेकर वोट किया, क्या उन सांसदों द्वारा ही सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका दाखिल की जा सकती है? सवाल इस पर भी बनता है कि क्या एक सांसद को वकील बने रहना चाहिए, क्योंकि इस केस में एक पक्ष के दोनों वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी सांसद हैं? ये सवाल इसलिए क्योंकि जब इस देश में आम आदमी अगर सरकारी नौकरी में है तो आर्थिक लाभ के लिए कोई और काम नहीं कर सकता, फिर एक सांसद कैसे अपने पेशे को जारी रख सकता है? क्योंकि सांसदों को भी तो सैलरी मिलती है? लेकिन इस विषय़ पर फिर कभी चर्चा करते हैं अभी सुप्रीम कोर्ट पर लौटते हैं.
देश की व्यवस्था कहती है सुप्रीम कोर्ट अपने आप में एक स्वतंत्र संवैधानिक व्यवस्था है, तो संसद एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के साथ कई मसलों में सुप्रीम कोर्ट से भी ज्यादा ताकतवर है. सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय वक्फ बोर्ड के खिलाफ 2021 में एक याचिका लगाते हैं, तो यही सुप्रीम कोर्ट उनसे पूछता है आपकी कितनी जमीन पर वक्फ बोर्ड ने कब्जा कर लिया, और याचिका खारिज कर दी. अब जज साहब ने अश्विनी उपाध्याय से ये सवाल क्यों पूछा, यही नहीं दोस्तों जब देश के दिग्गज वकील विष्णु शंकर जैन वक्फ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचते हैं तो जज साहब कहते हैं कि हाईकोर्ट जाओ, सुप्रीम कोर्ट क्यों आए, हमारा वक्त कीमती है, लेकिन जब वक्फ संशोधन कानूनके खिलाफ देश के 100 अलग-अलग लोग याचिका लगाते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट 24 घंटे के भीतर तैयार क्यों हो जाता है, इसकी कहानी समझने के लिए अगले 10 मिनट तक हमारे साथ बने रहिए, आपको बताते हैं सुप्रीम कोर्ट के बहाने कैसे नरेन्द्र मोदी की कुर्सी खींचने की तैयारी चल रही है. इस वीडियो को पूरा देखिएगा और आखिर में अपनी राय भी दीजिएगा.
साल 2014 तक सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच लगभग सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन जैसे ही नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, वो कानून मंत्री और देश के बड़े-बड़े कानून के जानकारों को बुलाते हैं, उनसे समझते हैं, जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में लग रहे धांधली के आरोपों पर बात करते हैं, और फिर नरेन्द्र मोदी सरकार कॉलेजियम सिस्टम जिससे जज अभी भी चुने जाते हैं, उसे हटाकर NJAC यानि नेशनल ज्यूडिशियल एप्वाइंटमेंट कमिशन हिंदी में कहें तो राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का प्रस्ताव सामने रखा. इस प्रस्ताव में क्या था, ये जानने से पहले आपको ये समझना होगा कि आजादी के 75 सालों तक हमारे देश के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति बहुत हैरान करने वाले तरीके से होती रही है. दोस्तों जरा सरल भाषा में आप समझिए कि जज साहब बात-बात पर गुस्सा क्यों हो जाते हैं. और उपराष्ट्रपति ने इन्हें सुपर संसद क्यों कह दिया. बीजेपी नेता निशिकांत दूबे ने ये क्यों कह दिया धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार होगा.
इसीलिए नरेन्द्र मोदी सरकार एक नया कानून लेकर आई, जिसमें ये नियम बनाया कि जिस कॉलेजियम सिस्टम में सिर्फ जजों का पैनल होता था, उसमें कानून मंत्रालय भी होगा, और दो विशेषज्ञ भी होंगे. इनके अलावा सुप्रीम कोर्ट के दो सीनियर जज और मुख्य न्यायाधीश होंगे, जिनकी सहमति से ये फैसला होगा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जिन जजों की नियुक्ति हो रही है, उनकी वरिष्ठता और योग्यता के आधार पर नियुक्ति हो, न कि परिवारवाद या भाई-भतीजावाद के आधार पर हो. हैरानी की बात दोस्तों ये है कि नरेन्द्र मोदी का ये ड्रीम प्रोजेक्ट अधूरा रह गया, क्योंकि कहा ये जाता है कि सुप्रीम कोर्ट की जड़ें बहुत मजबूत हैं, और इसी बात को लेकर कांग्रेस का आरोप है कि नरेन्द्र मोदी न्यायपालिका पर दबाव बना रहे हैं, संविधान ख़तरे में है, लोकतंत्र के मूल ढांचे पर प्रहार हो रहा है.
लेकिन बदलते भारत के दौर में जब हर क्षेत्र में बदलाव हुआ, यहां तक कि भारत के पुराने कानून को भी बदल दिया गया, यानि अंग्रेजों के सारे सिस्टम देश अपग्रेड कर रहा है, चाहे वो नई संसद हो या कानून में बदलाव की बात हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या नए सिरे से इस देश में नहीं हो पा रही है, इसी बात पर विवाद छिड़ा जब उपराष्ट्रपति ने जजों को सुपर संसद कह दिया. और उनका सीधा कहना था कि राष्ट्रपति को आदेश आप नहीं दे सकते, अब ये विवाद इसलिए गहरा गया क्योंकि जिस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा रही है, और जिस पर सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच सुनवाई कर रही है, अगर वो कानून में कोई बदलाव करते हैं तो आदेश राष्ट्रपति को जाएगा न कि सरकार को जाएगा. क्योंकि राष्ट्रपति ने वक्फ कानून पर मुहर लगा दी है. और राष्ट्रपति की मुहर लगती है तो किसी विधेयक को कानून का रूप मिल जाता है. इसलिए देश में वक्फ बोर्ड पर होने को कुछ भी हो सकता है, मोदी सरकार के 11 साल के पूरे कार्यकाल में किसी कानून को लेकर ये पहला मौका है, जब न्यायपालिका और विधायिका में खुलकर तकरार आमने-सामने आ गई है, बीजेपी नेता खुलकर सुप्रीम कोर्ट पर कई आरोप लगा रहे हैं, देश के उपराष्ट्रपति ने कई बातें कह दी है, मोदी सरकार लगातार उच्चस्तरीय बैठकें बुला रही हैं, राष्ट्रपति से देश के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री की मुलाकात हो रही है, 5 मई को फैसला आना है जस्टिस खन्ना जो देश के मुख्य न्यायाधीश हैं 13 मई को उनकी फेयरवेल पार्टी भी होनी है, क्या कोई वो ऐसा फैसला सुनाने जा रहे हैं, जो हिंदुस्तान के लोकतांत्रिक इतिहास में कभी सुनाया ही नहीं गया है, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट संसद के फैसले में सुझाव तो दे सकता है, अंतरिम रोक लगा सकता है लेकिन फाइनल कानून तो संसद मे ही बनता है