36 साल में पहली बार मायावती की BSP पर इतना बड़ा संकट, 2027 विधानसभा चुनाव पर सबकी नजर

Amanat Ansari 23 Dec 2025 11:12: PM 4 Mins
36 साल में पहली बार मायावती की BSP पर इतना बड़ा संकट,  2027 विधानसभा चुनाव पर सबकी नजर

नई दिल्ली: बहुजन समाज पार्टी (BSP), जो कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रमुख शक्ति थी और भारत की संसद में लगातार मौजूद रही है, अब अपने इतिहास के सबसे गंभीर संकट का सामना कर रही है. अगर बड़ा उलटफेर नहीं हुआ तो पार्टी 30 साल से अधिक समय में पहली बार संसद से बाहर हो जाएगी और राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी खोने के खतरे में पड़ सकती है.

नवंबर 2026 निर्णायक समय है, जब BSP के इकलौते सांसद रामजी गौतम का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हो जाएगा. उनके जाने से पार्टी की संसद में लगातार मौजूदगी टूट जाएगी, जो 1980 के दशक के अंत से चली आ रही थी. गौतम का रिटायरमेंट उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के 10 सदस्यों के निर्धारित रिटायरमेंट के साथ 25 नवंबर 2026 को हो रहा है.

इनमें से आठ भाजपा के, एक समाजवादी पार्टी (सपा) का और एक BSP का है. भाजपा के बृज लाल, सीमा द्विवेदी, चंद्रप्रभा उर्फ गीता, हरदीप सिंह पुरी, दिनेश शर्मा, नीरज शेखर, अरुण सिंह और बीएल वर्मा. सपा से प्रोफेसर राम गोपाल यादव रिटायर हो रहे हैं, जबकि रामजी गौतम के जाने से राज्यसभा में BSP की इकलौती प्रतिनिधित्व समाप्त हो जाएगी.

2024 के आम चुनावों से ही पार्टी के पास लोकसभा में कोई सांसद नहीं है, इसलिए यह स्थिति BSP को दोनों सदनों में एक भी सदस्य के बिना छोड़ देगी. BSP की राज्यसभा सदस्य को बदलने में असमर्थता की जड़ उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के लगभग ढह जाने में है, क्योंकि राज्यसभा सदस्य विधानसभा ही चुनती है. 403 सदस्यीय विधानसभा की वर्तमान स्थिति 402 विधायकों की है, एक सीट खाली है.

पार्टीवार संख्या इस प्रकार है...

  • भाजपा: 258
  • सपा: 103
  • अपना दल: 13
  • राष्ट्रीय लोक दल: 9
  • निषाद पार्टी: 5
  • सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी: 6़
  • कांग्रेस: 2
  • जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक): 2
  • BSP: 1
  • सपा बागी: 3  

इस गणना के अनुसार, एक राज्यसभा सदस्य चुनने के लिए 37 विधायकों की जरूरत होती है. इससे भाजपा 2026 में आठ सीटें और सपा दो सीटें हासिल कर सकती है. BSP के पास सिर्फ एक विधायक होने से वह चुनाव में उतरने की स्थिति में भी नहीं है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव ही BSP के लिए एकमात्र वास्तविक अवसर है कि वह विधायी ताकत दोबारा बनाए और 2029 के आम चुनावों से पहले संसद में वापसी कर सके.

1984 में कांशीराम द्वारा स्थापित BSP पांच साल के अंदर ही राजनीतिक रूप से प्रासंगिक हो गई थी. 1989 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में पार्टी ने 13 सीटें जीतीं, जो राज्यसभा प्रतिनिधित्व के लिए पर्याप्त नहीं थीं, लेकिन उसी साल लोकसभा चुनावों में सफलता ने इसकी भरपाई कर दी. उस साल BSP ने तीन सांसद संसद में भेजे.

मायावती (बिजनौर से), राम किशन यादव (आजमगढ़ से), हरभजन लाखा (पंजाब के फिल्लौर से) संसद पहुंचे थे. मायावती ने 1985 में बिजनौर से पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था लेकिन कांग्रेस नेता मीरा कुमार से हार गई थीं. बाद में उन्होंने बिजनौर को अपना राजनीतिक आधार बनाया, 1989 में सीट जीती और BSP की संसद में एंट्री सुनिश्चित की.

तब से BSP के पास संसद में कम से कम एक प्रतिनिधि हमेशा रहा, जो निरंतरता अब 2026 में टूटने वाली है. मायावती संसद में आने वाली पहली BSP नेताओं में थीं. हालांकि 1991 का लोकसभा चुनाव वे हार गईं, लेकिन उसी साल कांशीराम इटावा से जीते. 1993 में सपा के साथ गठबंधन में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़कर BSP ने 67 सीटें जीतीं. इस बढ़ी हुई विधायी ताकत से कांशीराम ने 1994 में मायावती को राज्यसभा भेजा.

मायावती 3 अप्रैल 1994 से राज्यसभा सदस्य बनीं और 25 अक्टूबर 1996 तक रहीं, जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने पर इस्तीफा दे दिया. 1994 से BSP ने राज्यसभा में लगातार प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया. यहां तक कि 2014 में जब लोकसभा में एक भी सीट नहीं जीती, तब भी राज्यसभा में मौजूदगी बरकरार रही. वह निरंतरता अब रामजी गौतम के रिटायरमेंट के साथ अंतिम रूप से समाप्त हो सकती है.

2024 लोकसभा चुनावों में एक भी सीट न जीत पाने से BSP का संकट गहरा गया. पार्टी का वोट शेयर 3.66 प्रतिशत से घटकर 2.04 प्रतिशत रह गया, जो राष्ट्रीय स्तर पर उसका सबसे खराब प्रदर्शन है. इस गिरावट ने अब BSP के राष्ट्रीय पार्टी दर्जे को गंभीर खतरे में डाल दिया है.

राष्ट्रीय पार्टी दर्जा कैसे काम करता है

चुनाव आयोग के 1968 में अधिसूचित नियमों के अनुसार, कोई पार्टी राष्ट्रीय पार्टी तभी बनती है अगर वह निम्नलिखित में से कोई एक शर्त पूरी करे... हाल के लोकसभा चुनाव में चार या अधिक राज्यों में कम से कम 6 प्रतिशत वैध वोट हासिल करे, या कम से कम चार लोकसभा सीटें जीते, या कम से कम 2 प्रतिशत लोकसभा सीटें जीते, जो कम से कम तीन राज्यों से हों, या कम से कम चार राज्यों में राज्य पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त हो.  

18वीं लोकसभा चुनावों में BSP ने कोई सीट नहीं जीती और राष्ट्रीय वोट शेयर सिर्फ 2.04 प्रतिशत रहा, इसलिए पहली दो शर्तें पूरी नहीं हुईं. अंतिम आंकड़े अभी आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुए हैं. तीसरी शर्त- चार या अधिक राज्यों में राज्य पार्टी का दर्जा भी चुनौतीपूर्ण है. 2019 से BSP केवल उत्तर प्रदेश में ही राज्य पार्टी मान्यता की शर्तें पूरी कर रही है.

एक समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में केंद्रीय शक्ति और राष्ट्रीय गठबंधनों में प्रमुख खिलाड़ी रही BSP अब ऐसे भविष्य का सामना कर रही है जहां संसद में उसकी कोई मौजूदगी नहीं होगी और राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता भी नहीं रहेगी. भारत में दलित असर्टियन की सबसे प्रमुख राजनीतिक मंच के रूप में उभरी इस पार्टी के लिए 2026-27 तक का समय निर्णायक साबित हो सकता है. यह तय करेगा कि वह पुनरुत्थान करेगी या राजनीतिक हाशिए पर और खिसकती जाएगी.

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