रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दो बालिगों के बीच लंबे समय तक सहमति से चले शारीरिक संबंध को महज इसलिए दुष्कर्म नहीं माना जा सकता कि बाद में शादी नहीं हो पाई. अदालत ने गिरिडीह निवासी एक युवक के खिलाफ दर्ज एफआईआर, निचली अदालत के संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया.
जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध परिस्थितियां दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक चले सहमति वाले रिश्ते की ओर इशारा करती हैं. बाद में शादी को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ. ऐसे मामले में युवक के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा.
मामला वर्ष 2016 का है. एक दोस्त की शादी में महिला और युवक की पहली मुलाकात हुई थी. इसके बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई और धीरे-धीरे प्रेम संबंध बन गए. महिला का आरोप था कि युवक शादी का भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता था. यह रिश्ता करीब सात साल तक चला. दिसंबर 2022 में दोनों रांची के एक होटल में ठहरे, जहां शारीरिक संबंध बने. महिला लगातार शादी के लिए दबाव बनाती रही, लेकिन युवक बात टालता रहा. अप्रैल 2023 में युवक ने मोबाइल बंद कर दिया. परिवार ने शादी से इनकार किया, जिसके बाद महिला ने गिरिडीह महिला थाने में आईपीसी की धारा 376(2)(एन) के तहत दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया.
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘प्रमोद सूर्यभान पवार’ और ‘महेश दामू खरे’ मामलों का हवाला देते हुए कहा कि शादी का वादा तभी झूठा माना जाएगा जब संबंध की शुरुआत में ही आरोपी की शादी करने की नीयत न रही हो. यदि शुरू में इरादा था लेकिन बाद में परिस्थितियों या विवाद के कारण शादी नहीं हुई, तो हर मामले को दुष्कर्म नहीं बनाया जा सकता. अदालत ने पाया कि सात साल से अधिक चले रिश्ते में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे साबित हो कि युवक की शुरुआत से ही शादी की मंशा नहीं थी. इस आधार पर हाईकोर्ट ने सीजेएम अदालत के 16 अगस्त 2024 के संज्ञान आदेश सहित पूरी कार्यवाही रद्द कर दी.