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नई दिल्ली: कहते हैं किसी सफल राजनीतिक पार्टी का वजूद जब खतरे में आ जाए तो उसे पुरानी नीतियों पर लौट आना चाहिए, और मायावती भी अब इसी प्लान में लगी हैं, यूपी विधानसभा चुनाव में बेशक 2 साल का वक्त बचा है, लेकिन मायावती ने इसकी तैयारी अभी से शुरू कर दी है, इसे लेकर 25 मार्च को उन्होंने एक बैठक बुलाई, जिसमें कई बड़े आदेश दिए, जिससे यूपी की सियासत में भूचाल आना तय है, न सिर्फ सपा बल्कि बीजेपी की परेशानी भी मायावती के इस दांव से बढ़ सकती है, 14 अप्रैल को बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती के मौके पर मायावती कुछ बड़ा ऐलान कर सकती हैं.
आदेश नंबर 1- सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत करने के लिए भाईचारा कमेटी बनाई जाए, पहले चरण में एससी, एसटी और ओबीसी को इसमें शामिल किया जाएगा, उसके बाद ब्राह्मण और दूसरी जातियों के लोगों को भी जोड़ा जाएगा, उनके साथ खुद मायावती बैठक करेंगी, इससे अखिलेश का पीडीए कमजोर हो सकता है.
आदेश नंबर 2- बसपा को मजबूत करने के लिए हर मंडल में 4 प्रभारी और जिले में दो-दो प्रभारी बनाए जाएंगे. करीब 20 जिलाध्यक्ष की उम्र 40 साल से कम है, बूथ कमेटी और सेक्टर कमेटी पर काम हो, ताकि संगठन गांव-गांव तक मजबूत हो. युवाओं को जोड़ा जाए, कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया जाए.
आदेश नंबर 3- बसपा कैडर कैंप में चंदा लेने की प्रथा अब खत्म कर दी गई है, 6 महीने का सदस्यता अभियान पूरा होने के बाद मायावती जनसभाओं को संबोधित करेंगी, खुद जगह-जगह पहुंचकर मोर्चा संभालेंगी.
आदेश नंबर 4- उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 200 सीटों पर जहां बसपा कमजोर है, वहां प्रभारी की नियुक्ति प्रक्रिया तेज कर दी गई है, यही प्रभारी अब तक पार्टी कैंडिडेट भी बनते रहे हैं, इस बार उन्हें चुनावी तैयारियों का मौका ज्यादा मिलेगा.
आदेश नंबर 5- बीजेपी, सपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों को हराकर राजनीतिक सत्ता की मास्टर चाबी हासिल करने से ही बहुजनों के अच्छे दिन आ सकते हैं, इसके लिए गांव-गांव जाकर लोगों को इनकी गलत नीतियों के प्रति जागरूक किया जाए.
लेकिन सवाल ये है कि मायावती की ये रणनीति क्या बसपा को मजबूत कर पाएगी, या फिर अखिलेश का पीडीए इससे कमजोर होगा और बीजेपी को इससे फायदा मिलने जा रहा है, राजनीतिक के जानकार कहते हैं मायावती आज भी अगर पुराने रूप में लौट जाती हैं तो फिर उत्तर प्रदेश की सियासत 360 डिग्री घूम सकती है, जो चंद्रशेखर दलितों के रहनुमा बने घूम रहे हैं, उन्हें भी ये अच्छी तरह पता है कि मायावती का सियासत में पूरी तरह से सक्रिय होना उनकी भी सियासत को कमजोर कर सकती है, लेकिन यहां ये भी समझना जरूरी है कि क्या 69 साल की उम्र में मायावती बसपा के अच्छे दिन लौटा पाएंगी. इससे पहले भी मायावती कई बैठकें कर चुकी हैं.
बसपा की स्थिति
जानकार बताते हैं कोर वोटर आज भी मायावती के साथ है, लेकिन बाकी वोट सपा और बीजेपी में चले गए. जिसे वापस लाने की कोशिश में मायावती अब जुट चुकी हैं. वहीं बीजेपी, कांग्रेस और सपा सहित अन्य पार्टियां भी अलक-अलग नीतिया अपना कर चुनावी रणनीति बना रही है.