मायावती के साथ जिंदगी का इतना बड़ा खेला होने वाला है कि उन्होंने ऐसा सपने में भी नहीं सोचा होगा, उनकी पार्टी के सभी 10 सांसद जिन्होंने 2019 के चुनाव में जीत हासिल की थी, एक साथ पार्टी छोड़ने वाले हैं, इनमें से दो तो पहले ही लगभग साइड हो चुके हैं, बाकी बचे 8 अलग-अलग पार्टियों के संपर्क में हैं।
अमरोहा से बसपा सांसद दानिश अली को मायावती ने पहले ही सस्पेंड कर दिया है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में मणिपुर में दानिश अली भी नजर आए थे, जिसके बाद से कयास लग रहे हैं कि वो कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं।
इससे पहले जौनपुर से बसपा सांसद श्याम सिंह यादव बीते साल ही राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए थे, पूछने पर कहा था कि निजी हैसियत से यात्रा में शामिल हुआ, लेकिन सूत्र बताते हैं कि उनका भी मन डोल रहा है।
मुख्तार अंसारी के बड़े भाई अफजाल अंसारी जो साल 2019 चुनाव में मायावती की पार्टी से सांसद बने, 2024 के चुनाव में गाजीपुर से सपा के टिकट पर चुनावी मैदान में हैं। अखिलेश यादव ने अफजाल प्रत्याशी बनाकर यूपी कांग्रेस के कद्दावर नेता अजय राय की परेशानी बढ़ा दी है, क्योंकि अफजाल के भाई मुख्तार ने अजय राय के भाई के साथ ऐसा किया है, जो माफी के लायक नहीं है, पर राजनीति ऐसी चीज है कि अजय राय को मुख्तार भाई के लिए प्रचार करना पड़ सकता है।
कुछ ऐसा ही हाल लालगंज सीट से सांसद संगीता आजाद, अंबेडकरनगर से रितेश पांडेय, श्रावस्ती से राम शिरोमणि, बिजनौर से मलूक नागर, सहारनपुर से हाजी फजलुर रहमान, नगीना से गिरीश चंद्र जाटव और घोसी से सांसद अतुल कुमार राय का भी है। कहा तो ये तक जा रहा है कि ऐसा नहीं है कि ये सभी बीजेपी में ही नहीं जाएंगे बल्कि 3-4 सांसद बीजेपी में, और बाकी के 3-4 कांग्रेस और सपा में जा सकते हैं। जिसके बाद से सवाल ये उठ रहे हैं कि आखिर बसपा सांसदों का अचानक से मोहभंग क्यों हो रहा है, मायावती ने तो ये तक कहा था कि गठबंधन में चुनाव लड़ने से पार्टी को नुकसान होता है, इसलिए बसपा अकेले ही चुनाव लड़ेगी, पर यहां तो ऐसा लग रहा है कि सभी सांसदों के पार्टी छोड़ने से पार्टी का ही अस्तित्व खत्म हो सकता है। इसका जवाब तलाशने की जब हमने कोशिश की तो पता चला कि जिस दौर में हर पार्टी अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है, अखिलेश राहुल के साथ गठबंधन कर रहे हैं, छोटे-छोटे दल के नेता भी अपना सेफ फ्यूचर तलाश रहे हैं, राजा भैया के दर पर कभी सपा तो कभी बीजेपी के नेता पहुंच रहे हैं, उस दौर में मायावती बंद कमरे में शांतिपूर्वक बैठी हुई हैं। ऐसा लगता है मानो वो सियासी लड़ाई भूल गई हैं, मायावती के करीबी बताते हैं कि उनकी उम्र अब 68 साल हो चुकी है, वो राजनीतिक संन्यास के दौर में पहुंच चुकी है, पर जो नए नेता, उनकी पार्टी से जुड़े हैं, जिन्होंने 2019 के मोदी-योगी लहर में भी यूपी जैसे राज्य में 10 सीटें जीती थी, वो तो अपना भविष्य तलाशेंगे ही, बसपा के एक सांसद तो ये तक कहते हैं कि मैं संगठन की बैठकों में नहीं बुलाया जाता हूं तो मुझे दूसरा विकल्प देखना ही होगा, हर कोई आगे बढ़ने के लिए राजनीति में आता है।
मतलब साफ है कि मायावती एक्टिव नहीं होंगी तो नेता इधर-उधर जाएंगे ही। और राज्यसभा चुनाव से पहले अगर ऐसा हो गया तो समझिए कि बीजेपी के आठवें उम्मीदवार की जीत आसान हो सकती है।