नई दिल्ली: प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के मुख्य स्नान के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुए विवाद ने काफी सुर्खियां बटोरी हैं. इस घटना पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने अपनी प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा रथ पर सवार होकर स्नान करने की कोशिश को शास्त्र-विरुद्ध करार दिया. रामभद्राचार्य का कहना है कि धार्मिक परंपराओं और शास्त्रीय नियमों का पालन सबसे महत्वपूर्ण है. जो व्यक्ति शास्त्रों के खिलाफ कार्य करता है, उसे उसके परिणामस्वरूप दुख ही मिलता है और सुख-शांति की प्राप्ति नहीं होती.
उन्होंने अपने और अपने अनुयायियों का उदाहरण देते हुए बताया कि वे स्वयं और उनके शिष्य हमेशा पैदल चलकर ही संगम स्नान करते हैं, क्योंकि यही शास्त्रों में निर्धारित सही विधि है. रामभद्राचार्य ने जोर देकर कहा कि शास्त्र-विरुद्ध आचरण करने वाले को न तो सुख मिलता है, न शांति और न ही उत्तम गति प्राप्त होती है.
कब और कैसे शुरू हुआ विवाद
यह विवाद मौनी अमावस्या के दिन शुरू हुआ, जब शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ रथ और पालकी पर सवार होकर संगम की ओर बढ़े थे. भीड़ के दबाव और प्रशासनिक व्यवस्था के कारण उन्हें रोका गया, जिससे धक्का-मुक्की हुई और वे बिना स्नान किए लौट आए. बाद में वे धरने पर बैठ गए. रामभद्राचार्य की टिप्पणी से इस मुद्दे पर संत समुदाय के बीच मतभेद और स्पष्ट हो गए हैं, जहां शास्त्रीय परंपरा को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं.