नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल की सियासत में विधानसभा चुनाव प्रचार के बीच सायनी घोष खूब वायरल है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद सायनी घोष इन दिनों अपनी रैलियों में हृदय माझे काबा, नयने मदीना गीत गाकर चर्चाओं में आ गई है. यह गीत न सिर्फ सभाओं में गूंज रहा है, बल्कि सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है. टीएमसी समर्थक इसे सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बता रहे हैं, जबकि बीजेपी तुष्टीकरण की राजनीति करार दिया है.
तृणमूल कांग्रेस की ओर से पश्चिम बंगाल में सायनी घोष की गीतों के माध्यम से राजनीति और सभी समुदायों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है. वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने इसे खुलकर मुस्लिम तुष्टीकरण कहा है. भाजपा नेताओं का आरोप है कि चुनावी फायदे के लिए धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है. सायनी घोष का राजनीतिक सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा है. अभिनय की दुनिया से राजनीति में आने वाली घोष ने 2021 में टीएमसी जॉइन की. बेहद ही कम समय में ही पार्टी में अहम भूमिका हासिल कर ली.
2024 में बनी सांसद
सायनी घोष 2024 के लोकसभा चुनाव में जादवपुर सीट से जीत हासिल कर राजनीतिक पकड़ मजबूत की. इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्हें आसनसोल दक्षिण सीट से हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताया और उन्हें यूथ टीएमसी की कमान सौंपी. टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व खासकर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के करीबी मानी जाने वाली सायनी घोष ने संगठन में तेजी से अपनी पहचान बनाई है. यही वजह है कि चुनावी मंचों पर उनका सक्रिय होना पार्टी की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
काफी विवादों में रही है सायनी घोष
बंगाल में यह पहला मौका नहीं है जब सायनी घोष विवादों में आई हैं. 2022 के शिक्षक भर्ती घोटाले में उनका नाम सामने आया था, जिसके बाद प्रवर्तन निदेशालय ने उनसे लंबी पूछताछ भी की थी. ऐसे में अब उनका यह नया अंदाज भी राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि बंगाल जैसे राज्य में इस तरह के गीतों का इस्तेमाल सीधे तौर पर वोटरों की भावनाओं से जुड़ने की कोशिश हो सकती है. खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में इस गीत का बार-बार इस्तेमाल चुनावी रणनीति का संकेत माना जा रहा है.
सोशल मीडिया पर वायरल है वीडियो
सायनी घोष का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल है. एक ओर जहां समर्थक इसे गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक बता रहे हैं, वहीं विरोधी इसे पहचान की राजनीति का उदाहरण कह रहे हैं. चुनावी मौसम में यह विवाद आगे और कितना गहराएगा, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि बंगाल की राजनीति में यह गीत एक नया मुद्दा बन चुका है.