प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ट्रांसजेंडर महिला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत ‘महिला’ की परिभाषा में नहीं आती. इसलिए शादी का झांसा देकर यौन संबंध बनाने से जुड़ी यह धारा उनके मामले में लागू नहीं होगी. अदालत ने इसी आधार पर बरेली के मोहम्मद साकिर उर्फ साकिर को जमानत दे दी है.
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने बरेली के इज्जतनगर थाने में दर्ज FIR के क्रम में दायर जमानत अर्जी पर यह आदेश दिया. FIR के अनुसार शिकायतकर्ता ट्रांसजेंडर महिला है. उनका जन्म पुरुष के रूप में हुआ था और 11 अप्रैल 2023 को सर्जरी के बाद वह महिला बनी. आरोपित साकिर ने शादी का वादा कर डेढ़ साल तक उससे संबंध रखा, पांच लाख रुपये से अधिक लिए और बाद में शादी से इनकार कर दिया.
कोर्ट का तर्क?
आरोपित के वकील ने दलील दी कि BNS की धारा 2(35) में ‘महिला’ का अर्थ महिला मानव है, जबकि धारा 2(10) में ट्रांसजेंडर को अलग लिंग माना गया है. ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम, 2019 के अनुसार लिंग परिवर्तन सर्जरी के बाद भी व्यक्ति ट्रांसजेंडर ही रहता है. मेडिकल पैनल रिपोर्ट में भी शिकायतकर्ता को बिना गर्भाशय बदले हुए जननांग वाला पुरुष बताया गया.
अदालत ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के भूपेश ठाकुर मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि BNS में महिला और ट्रांसजेंडर की अलग पहचान है. ट्रांसजेंडर व्यक्ति के यौन शोषण के लिए अधिनियम की धारा 18(डी) में विशेष प्रावधान है, जिसमें दो साल तक की सजा है. अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता ने मेडिकल जांच से इनकार किया था. आखिरकार कोर्ट ने आरोपित को शर्तों के साथ जमानत दे दी. यह फैसला ट्रांसजेंडर अधिकारों और BNS की व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है.