नई दिल्ली: बिहार में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के भीतर भूचाल आ गया है. एक ही दिन में सात बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए और सबकी एक ही शिकायत – कुशवाहा जी ने वंशवाद की सारी हदें पार कर दीं.
दरअसल, नीतीश कैबिनेट में मंत्री पद की रेस में सबको लग रहा था कि सासाराम से नवनिर्वाचित विधायक और उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता कुशवाहा शपथ लेंगी, लेकिन चौंकाने वाला फैसला हुआ – मंत्री बने उनके बेटे दीपक प्रकाश, जो न विधायक हैं, न एमएलसी. पंचायती राज विभाग की कमान सीधे बेटे के हाथ में थमा दी गई.
बस यहीं से बगावत भड़क गई. पार्टी के चारों नवनिर्वाचित विधायकों को दरकिनार कर एक गैर-विधायक बेटे को मंत्री बनाना कार्यकर्ताओं को नागवार गुजरा. नतीजा – राज्य महासचिव राहुल कुमार, राजेश रंजन सिंह, बिपिन बिहारी चौरसिया, प्रमोद यादव, शेखपुरा जिला अध्यक्ष पप्पू मंडल, उपाध्यक्ष जितेंद्र नाथ और महेंद्र कुशवाहा समेत सात नेताओं ने इस्तीफा ठोंक दिया.
इस्तीफा देते वक्त इन नेताओं ने खुलकर बोला – “जो व्यक्ति दिन-रात वंशवाद के खिलाफ भाषण देता था, वही आज अपने बेटे को बिना लड़े मंत्री बना रहा है. ये दोहरा चरित्र है.”
एक बड़बोले नेता ने तो यहाँ तक कह दिया, “पार्टी अब पति-पत्नी-बेटे की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गई है.”
खुद उपेंद्र कुशवाहा ने बेटे का बचाव करते हुए कहा कि दीपक कंप्यूटर इंजीनियर है, मेहनती है, मौका दीजिए, वो साबित कर देगा. वंशवाद के सवाल पर मुस्कुराते हुए बोले, “समुद्र मंथन में विष भी निकलता है, किसी को पीना ही पड़ता है.” और नीतीश कुमार वाला पुराना डायलॉग भी दोहरा दिया – “खाना खाते वक्त मक्खियाँ भिनभिनाती हैं, बायें हाथ से भगाओ, दायें से खाओ.”
लेकिन अंदर की खबर कुछ और है. कुशवाहा के करीबी लोग नाम न छापने की शर्त पर बता रहे हैं कि उपेंद्र जी को अब अपने अलावा किसी पर भरोसा ही नहीं रहा. न अपने पुराने साथियों पर, न अपनी पार्टी पर. यही वजह है कि मंत्री पद भी घर में ही रखा.
राजनीतिक हलकों में चर्चा यह भी है कि कुशवाहा की यही अस्थिरता उन्हें बार-बार महँगी पड़ती है. 2009 से अब तक तीसरी बार अपनी ही बनाई पार्टी को ठुकराकर कहीं और गए और फिर लौटे. जेडीयू छोड़ी, आरएलएसपी बनाई, एनसीपी जॉइन की, फिर एनडीए में आए, फिर बाहर गए, फिर नीतीश के पास लौटे – इस बार चुनाव से ठीक पहले.
अब जब चार सीटें जीतकर आए, तो लगा स्थिरता आई, लेकिन बेटे को मंत्री बनाते ही फिर वही पुराना खेल शुरू हो गया. कार्यकर्ता पूछ रहे हैं – हम दिन-रात खपे, चार विधायक जीताए, और इनाम मिला घर के लाल को?
फिलहाल कुशवाहा खेमे में सन्नाटा है. सात इस्तीफे छोटे नहीं हैं – इनमें जिले से लेकर राज्य स्तर के सारे बड़े पदाधिकारी शामिल हैं. आने वाले दिनों में और लोग पार्टी छोड़ सकते हैं.
बिहार की राजनीति में एक बार फिर साबित हो गया – यहाँ वंशवाद की बात करने वाले भी जब सत्ता की चाबी हाथ आती है, तो सबसे पहले अपना ताला खोलते हैं. बाकी कार्यकर्ता बस तमाशा देखते रह जाते हैं.