ये कहानी एक ऐसे तेज तर्रार आईपीएस ऑफिसर की है, जो एसएचओ से लेकर यूपी का डीजीपी तक बना. लेकिन एक वक्त ऐसा आया कि वो मुख्यमंत्री के सामने थर्र-थर्र कांपने लगा, उसकी आवाज हकलाने लगी, और वो जिंदगी से हारने पर मजबूर हो गया. जिस लखनऊ में मुख्यमंत्री बैठकर सरकार चलाया करते थे, उसी लखनऊ में एक ऑफिसर के साथ कुछ ऐसा हुआ, जिसकी कहानी सालों तक याद रखी जाएगी.
ये किस्सा है साल 1993 का. 1 जून 1993 को, प्रयागराज के तत्कालीन एसपी ओपी सिंह का तबादला होता है, अचानक उन्हें सीनियर अधिकारी की कॉल आती है, और वो कहते हैं कि तुम्हें जल्दी से जल्दी लखनऊ एसएसपी की कुर्सी संभालनी है. उस वक्त लखनऊ के एसएसपी बनने वाले ओपी सिंह को इस बात का आभास नहीं था कि अगले 24 घंटे में भारतीय इतिहास की बहुत बड़ी घटना घटने वाली है. 1983 बैच के अधिकारी ओपी सिंह ने अपनी किताब क्राइम, ग्रिम एंड गम्प्शन: केस फाइल्स ऑफ एन आईपीएस ऑफिसर में बकायदा एक अलग से चैप्टर बनाया है, जिसका नाम है सुनामी वर्ष, वो इस चैप्टर में लिखते हैं.
2 जून 1995 को मैंने लखनऊ के एसएसपी का पदभार संभाला, उसी दिन मीरा बाई मार्ग पर स्थित गेस्ट हाउस में कुछ ‘गैरकानूनी तत्वों द्वारा गड़बड़ी’ को लेकर डीजीपी का फोन आया. शाम 5:20 बजे जिलाधिकारी और अन्य अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंचा. तभी ये पता चला कि सुइट संख्या 1 और 2 में उस समय रह रही मायावती इस चर्चा के बीच गेस्टहाउस में अपने विधायकों से मुलाकात कर रही थीं कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापस ले लिया है.
बिजली आपूर्ति बंद होने और टेलीफोन लाइनें काट दिए जाने के कारण स्थिति काफी अस्पष्ट थी. पूरी तरह अराजकता की स्थिति थी. हमने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सुइट्स एक और दो की सुरक्षा कड़ी कर दी जाए, अचानक से हंगामा शुरू हो गया, पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया. जो सिलेंडर वाली अफवाह फैलाई जाती है, उसकी कहानी कुछ ऐसी है कि मायावती ने चाय पीने की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन संपदा अधिकारी ने कहा कि रसोई गैस नहीं है, तो पड़ोस से सिलेंडर की व्यवस्था की गई. सिलेंडर को रसोई क्षेत्र की ओर लुढ़का कर ले जाते देख और उससे हुई खड़खड़ की आवाज से यह अफवाह फैल गई कि मायावती को नुकसान पहुंचाने के लिए सिलेंडर लाया गया है.
हालांकि ये बस शुरुआत थी, हैरान करने वाली और घटनाएं अभी बाकी थीं. मायावती ने उसी दिन राज्यपाल को एक पत्र लिखकर आरोप लगाया कि गेस्ट हाउस में एकत्र हुए सपा सदस्यों ने हमला किया और कुछ बसपा कार्यकर्ताओं को ‘पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारियों की नाक के नीचे’ उठाकर ले गए. पुलिस अधिकारी के तौर पर मैं फिर से दो राजनीतिक दलों के बीच शक्ति प्रदर्शन के खेल में लगाए जा रहे आरोप-प्रत्यारोप में फंस गया.
राज्यपाल ने उसी रात मुलायम सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया और मायावती को नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई. नई सरकार ने 4 जून 1995 को मुझे सस्पेंड कर दिया गया. लेकिन केवल मुझे ही क्यों? हम चार लोग थे गेस्ट हाउस में. मेरे अलावा तीन, डीएम, एडीएम (सिटी) और एसपी (सिटी) भी थे, पर सिर्फ मुझे सस्पेंड किया गया. निलंबन के बाद एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी से मिलने गया, और उनकी भाव भंगिमा आज तक नहीं भूला हूं.
हालांकि कहानी यहीं खत्म नहीं होती बल्कि कहानी इससे आगे बढ़ती है और करीब तीन साल बाद ओपी सिंह मायावती से मिलते हैं, तब ओपी सिंह आजमगढ़ के उप महानिरीक्षक के पद पर तैनात थे. तब वो मायावती से कहते हैं कि लंबे समय से मैं इस दिन का इंतजार कर रहा था महोदया कि आपसे मिलकर स्थिति स्पष्ट करूं. पूरे सम्मान के साथ, मैं आपसे सीधे कुछ पूछना चाहता हूं.
मायावती कहती हैं आप पूछिए तभी ओपी सिंह (कांपती आवाज के साथ)- दो जून 1995 के उस मनहूस दिन पर उनकी क्या गलती थी? उन्होंने मायावती से कहा, ‘मैडम, क्यों? मुझे क्यों निलंबित किया गया? मैं एक गैर राजनीतिक अधिकारी हूं। मेरा पूरा सर्विस रिकॉर्ड इसकी तसदीक कर देगा. मायावती कुछ जवाब नहीं देती, पर ओपी सिंह समझ जाते हैं कि मेरे दिमाग में बरसों से बात चल रही थी कि दो पार्टियों के बीच में फंसकर रह गया, वही सच है, अब इस खुलासे पर आप क्या कहना चाहेंगे कमेंट कर जरूर बताएं.