नई दिल्ली: दुनिया के जलवायु वैज्ञानिकों में इन दिनों एक बड़ी चिंता फैली हुई है. नए अध्ययनों और सैटेलाइट निगरानी के आधार पर संकेत मिल रहे हैं कि प्रशांत महासागर में एक बेहद शक्तिशाली 'सुपर एल नीनो' बन रहा है, जो 150 साल पहले हुई सबसे भयावह पर्यावरणीय आपदा की याद दिला रहा है.
सुपर एल नीनो क्या है?
एल नीनो तब होता है जब प्रशांत महासागर की सतह का पानी सामान्य से काफी गर्म हो जाता है. सामान्य एल नीनो कई सालों में एक बार आता है और मौसम के पैटर्न बदल देता है. लेकिन जब यह गर्मी 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाती है, तो इसे सुपर एल नीनो कहा जाता है. यूरोपीय मौसम केंद्र (ECMWF) के पूर्वानुमान के मुताबिक, 2026 के अंत तक यह विसंगति 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकती है, जो इसे अब तक का सबसे ताकतवर एल नीनो बना सकती है.
1877 में क्या हुआ था?
वैज्ञानिक और इतिहासकार 1877-78 के एल नीनो को मानव इतिहास की सबसे घातक जलवायु घटना मानते हैं. उस समय आए भीषण सूखे, अकाल और महामारियों (हैजा, प्लेग, मलेरिया) ने पूरे विश्व में करीब 5 करोड़ लोगों की जान ली थी.
भारत पर सबसे बड़ा खतरा
भारत के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है क्योंकि हमारा मानसून सीधे तौर पर एल नीनो से प्रभावित होता है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) पहले ही 2026 में औसत से कम बारिश की संभावना जता चुका है. देश की 70% से ज्यादा बारिश मानसून (जून-सितंबर) पर निर्भर करती है. कृषि क्षेत्र में आधी से ज्यादा आबादी जुड़ी हुई है.
अगर मानसून कमजोर रहा तो धान, सोयाबीन, कपास जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन घटेगा, खाद्यान्न की कमी और महंगाई बढ़ेगी. जलाशयों में पानी कम होने से बिजली उत्पादन प्रभावित होगा.
2027 सबसे गर्म साल बन सकता है
जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि इस सुपर एल नीनो का असर सिर्फ सूखे तक सीमित नहीं रहेगा. यह वैश्विक तापमान को और बढ़ाएगा, जिससे 2027 इतिहास का सबसे गर्म वर्ष साबित हो सकता है. वैज्ञानिक कैथरीन हायहो और लेखक डेविड वालेस-वेल्स जैसी हस्तियों ने चेतावनी दी है कि स्थिति एक बार बिगड़ने के बाद उसे नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो जाएगा.