नई दिल्ली: भारत के चुनाव आयोग (ECI) में एक बार फिर विवाद छिड़ गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ग्यानेश कुमार पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की भूमिका भी पूरी तरह सवालों से परे नहीं है. द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के अनुसार, पिछले करीब 10 महीनों में संधू और जोशी ने चुनावी नामावली, फॉर्म-6, वोटर डेटा तक पहुंच और आईटी सिस्टम से जुड़े मुद्दों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की.
रिपोर्ट में कहा गया है कि कभी-कभी एक ही दिन में चार बार भी आपत्तियां दर्ज हुईं. खासतौर पर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और चुनावी रोल डेटाबेस के केंद्रीकरण को लेकर दोनों आयुक्तों ने चिंता जताई थी. रिपोर्ट के मुताबिक, 16 मई 2026 को विवेक जोशी ने फॉर्म-6 में प्रस्तावित बदलावों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह बदलाव SIR आदेश से नहीं किए जा सकते, क्योंकि फॉर्म रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के तहत निर्धारित है. उन्होंने मामले को सरकार के पास भेजने का सुझाव दिया.
19 मई को संधू भी इससे सहमत हुए. फिर भी, विवादास्पद बदलाव ECINet पोर्टल पर दिखाई दिए. 13 अगस्त को संधू ने फिर इन्हें अवैध बताया और हटाने की मांग की. आर्टिकल 324 के तहत चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है. 2023 के कानून के अनुसार, बहुसदस्यीय आयोग में सर्वसम्मति न होने पर बहुमत से फैसला लिया जा सकता है. CEC और दोनों EC बराबर हैं.
इसलिए सवाल यह है कि दोनों आयुक्तों की आपत्तियों पर क्या औपचारिक प्रक्रिया अपनाई गई? क्या बहुमत का सम्मान किया गया? हां, ग्यानेश कुमार पर जवाबदेही तय होनी चाहिए. अगर वैध बहुमत को नजरअंदाज किया गया या वैधानिक शक्तियों को कमजोर किया गया, तो स्पष्टीकरण जरूरी है. लेकिन सवाल सिर्फ उन तक सीमित नहीं रहना चाहिए.
अगर दोनों EC मानते थे कि उनकी आपत्तियां बार-बार नजरअंदाज हो रही हैं, तो वे संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस और बैठकों में क्यों शामिल होते रहे? उन्होंने कैबिनेट सचिव को पत्र क्यों लिखा, जबकि चुनाव आयोग स्वतंत्र संस्था है और उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं? अगर संस्थागत तंत्र फेल हो चुका था, तो इस्तीफा क्यों नहीं दिया?
राजनीतिक विश्लेषक राजत सेठी और योगेंद्र यादव जैसे विशेषज्ञों ने भी इन सवालों को उठाया है. यादव ने पूछा कि क्या कैबिनेट सचिव चुनाव आयोग के बॉस हैं? सेठी ने कहा कि अगर दोनों आयुक्त एक तरफ थे, तो वे खुद पूर्ण बैठक बुला सकते थे. जुलाई 28 को प्रशासनिक विभाजन में बदलाव के बाद दोनों ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को पत्र लिखा और बाद में संयुक्त रूप से आदेश को पलट भी दिया. इससे साफ है कि वे सामूहिक अधिकार का इस्तेमाल कर सकते थे.
फिर पहले के विवादों में ऐसा क्यों नहीं किया? CEC ग्यानेश कुमार को जवाब देना ही होगा. लेकिन दो चुनाव आयुक्तों को भी सवालों से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए. संस्था की विश्वसनीयता के लिए तीनों की जवाबदेही बराबर जरूरी है. चुनाव आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर उठे इन सवालों का जवाब अब सार्वजनिक रूप से आना चाहिए.