नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के तहत लागू किए गए 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026' (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) के खिलाफ विरोध तेज होता जा रहा है.
ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने, शिकायत निवारण तंत्र मजबूत करने और समानता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जनवरी 2026 में अधिसूचित किए गए थे, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों, कुछ संगठनों और अब प्रशासनिक अधिकारियों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा इसे एकतरफा और दुरुपयोग की आशंका वाला बताकर विरोध किया जा रहा है. सोशल मीडिया पर #UGCRollback जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट में भी इसकी चुनौती दी गई है.
इस विवाद की आंच उत्तर प्रदेश तक पहुंच गई है. बरेली में तैनात पीसीएस अधिकारी और सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया. अलंकार अग्निहोत्री, जो 2019 बैच के पीसीएस अधिकारी हैं और पहले अटेम्प्ट में ही रैंक हासिल कर चुके हैं, ने इस्तीफे में UGC के नए नियमों को 'काला कानून' करार दिया.
साथ ही, उन्होंने जोशीमठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के ब्राह्मण शिष्यों के साथ कथित अपमान का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसी नीतियां समाज में विभाजन पैदा कर रही हैं. ब्राह्मण समाज के लोगों ने उनका खुलकर समर्थन किया है और कई जगहों पर उनके इस्तीफे की सराहना की जा रही है.
इसी कड़ी में भाजपा के भीतर भी असंतोष उभर आया है भाजपा से जुड़े 11 कार्यकर्ताओं ने पार्टी को सामूहिक इस्तीफा सौंप दिया. इस्तीफा देने वालों में मंडल महामंत्री अंकित तिवारी, मंडल अध्यक्ष आलोक सिंह, मंडल मंत्री महावीर सिंह, मोहित मिश्रा, वेद प्रकाश सिंह, नीर पांडेय (शक्ति केंद्र संयोजक), युवा मोर्चा मंडल अध्यक्ष अनूप सिंह, युवा मोर्चा मंडल महामंत्री राज विक्रम सिंह, पूर्व मंडल मंत्री अभिषेक अवस्थी, बूथ अध्यक्ष विवेक सिंह और पूर्व सेक्टर संयोजक कमल सिंह शामिल हैं.
इन कार्यकर्ताओं ने इस्तीफे में आरोप लगाया कि पार्टी अपने मूल उद्देश्यों से भटक रही है और UGC के नए नियम बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं. उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे प्रेरणा स्रोतों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी नीतियां सामाजिक सद्भाव के खिलाफ हैं.
विरोध अब प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर फैलता दिख रहा है. कई जगहों पर छात्र संगठन, सामान्य वर्ग के प्रतिनिधि और अब भाजपा के स्थानीय स्तर के कार्यकर्ता भी सड़कों पर उतर रहे हैं. केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या संशोधन की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन बढ़ते दबाव के बीच स्थिति पर नजर रखी जा रही है. यह मामला उच्च शिक्षा में समानता और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन की बहस को और तेज कर सकता है.