लखनऊ : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 का असली सियासी रण पूर्वांचल में तय होता दिख रहा है. वाराणसी, गोरखपुर, आजमगढ़, गाजीपुर, मऊ, बलिया, मिर्जापुर और जौनपुर जैसे इलाकों में बीजेपी और समाजवादी पार्टी दोनों ने संगठन को चुनावी मोड में डाल दिया है. 2022 के नतीजों ने भी साफ किया था कि पूर्वांचल बीजेपी के लिए हमेशा आसान मैदान नहीं है. वाराणसी, आजमगढ़ और विंध्याचल मंडल की 61 सीटों में बीजेपी और सपा ने 30-30 सीटें जीती थीं.
बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मजबूत छवि, संगठन का बूथ नेटवर्क और सरकार के विकास कार्य हैं. पार्टी ने 2027 के लिए विनोद तावड़े को यूपी का प्रभारी बनाकर चुनावी मैनेजमेंट को धार देने का संकेत दिया है. साथ ही सोशल मीडिया और मंडल स्तर तक डिजिटल नेटवर्क मजबूत करने पर जोर है.
दूसरी तरफ अखिलेश यादव की सपा 2027 में 2022 के मुकाबले ज्यादा आक्रामक रणनीति के साथ उतर रही है. पार्टी का PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण अब नए सामाजिक समूहों तक विस्तार लेने की कोशिश कर रहा है. ब्राह्मण वोटरों को जोड़ने की कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है.
सपा बूथ स्तर पर भी माइक्रो-मैनेजमेंट कर रही है. पार्टी ने हर बूथ पर नए वोट जोड़ने का फॉर्मूला तैयार किया है, जबकि अखिलेश नेताओं के बयानों में अनुशासन पर भी जोर दे रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2022 में पूर्वांचल में जहां बीजेपी को नुकसान और सपा को फायदा मिला था, क्या 2027 में तस्वीर फिर पलटेगी. फिलहाल बीजेपी संगठन और सत्ता की ताकत के साथ आगे है, लेकिन सपा सामाजिक समीकरणों और बूथ सेंधमारी के जरिए मुकाबला बराबरी का बनाने की कोशिश में है. यानी पूर्वांचल में लड़ाई कांटे की है और 2027 में जिसकी सामाजिक इंजीनियरिंग और बूथ मैनेजमेंट बेहतर रहा, वही बाजी मार सकता है.