लखनऊ : उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाला चुनाव सियासी तौर पर बेहद दिलचस्प होता जा रहा है. नौ सीटों पर बीजेपी और सपा के उम्मीदवारों की जीत का गणित लगभग साफ माना जा रहा है, लेकिन 10वीं सीट पर मामला अटक गया है. इस सीट के लिए दोनों दलों के बीच विधायकों के समर्थन और संभावित क्रॉस वोटिंग को लेकर रणनीति तेज हो गई है.
राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 37 प्रथम वरीयता वोट की जरूरत है. बीजेपी के पास 256 विधायक हैं. सात उम्मीदवारों को जिताने के लिए 259 वोट चाहिए, यानी सातवीं सीट के लिए भी पार्टी को सहयोगी या अन्य विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी. सपा के बागी माने जाने वाले मनोज पांडेय, अभय सिंह और राकेश सिंह जैसे विधायकों के रुख पर भी नजर रहेगी.
एनडीए के सहयोगी दलों को जोड़ने पर बीजेपी के पास आठवीं सीट के लिए पर्याप्त संख्या नहीं बनती. सहयोगी दलों के कुछ विधायकों के रुख को लेकर भी अटकलें हैं. सुभासपा और रालोद के कुछ विधायक सपा के साथ पुराने राजनीतिक संबंधों और समीकरणों के चलते किस तरफ जाएंगे, यह चुनाव के दौरान अहम हो सकता है.
उधर सपा के पास तीसरी सीट के लिए फिलहाल करीब 27 विधायकों का आंकड़ा बताया जा रहा है. यदि सहयोगी दलों के कुछ विधायक सपा के साथ आते हैं तो संख्या 35 के आसपास पहुंच सकती है. ऐसे में दो और वोटों की जरूरत होगी.
सबसे बड़ा सवाल क्रॉस वोटिंग का है. 2027 विधानसभा चुनाव से पहले टिकट और राजनीतिक भविष्य को लेकर विधायकों के अपने-अपने समीकरण भी बन सकते हैं. ऐसे में राज्यसभा की 10वीं सीट पर आखिरी समय में समर्थन का गणित बदलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
यानी इस चुनाव में सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि अंतिम समय की रणनीति, सहयोगी दलों का रुख और विधायकों की पसंद निर्णायक भूमिका निभा सकती है.